गुर्जर नहीं, हम सबकी हार है यह

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मैं तो इसे रामेश्वर गुर्जर की हार नहीं मानता। टी टी नगर स्टेडियम में हुए इस तमाशे को देखने के लिए मैं भी मौजूद था। यह हार है रामेश्वर के अलावा कई दूसरों की जो सभी उतावली के शिकार हैं। 




प्रकाश भटनागर 

ध्यप्रदेश के मंत्री जीतू पटवारी बेताब थे कि अगला उसेन बोल्ट कहा जा रहा यह धावक केंद्र सरकार से पहले उनके साथ नजर आ जाये। शिवराज सिंह चौहान व्याकुल थे कि किसी तरह गुर्जर को केंद्र सरकार से सहायता दिलाकर नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह सहित केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू की नजर में अपने नंबर बढ़ा सकें। सोमवार से पहले तक गुर्जर को मदद देने की कीमत जमकर बटोरी गयी लोकप्रियता से आसानी से वसूल की जा सकती थी। सोशल मीडिया और मीडिया तो खैर अधैर्य से भरे लोगों की खदान बन गये हैं। इनसे जुड़े तमाम लोग गुर्जर की खबर बता/छाप या दिखाकर एक चर्चित मामले में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराने के जतन में लग गये थे।


इस सबके बीच हुआ यह कि गुर्जर एक ट्रायल दौड़ में सबसे पीछे रह गये। अब तर्क दिये जा रहे हैं। यह युवा लगातार दौड़ने से अपनी रफ्तार मंद होने की दलील दे रहा है। मंत्री पटवारी गुर्जर को एक महीने की खास ट्रेनिंग की बात कहकर अपनी जगहंसाई को ढंकने का प्रयास करने में जुट गये हैं। सोशल मीडिया पर कई थाली के बैंगन लुढ़कते हुए उस गुर्जर की खिंचाई करने में जुट गये हैं, जो कल तक उनकी पोस्ट और पोस्ट किये गये वीडियोज में बोल्ट के सशक्त विकल्प को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे थे। मीडिया सांप निकलने के बाद लकीर पीटते हुए एक युवक के सपनों की भ्रूण हत्या को अपनी-अपनी तरह से समाचार माध्यमों में स्थान दे रहा है। रामेश्वर चौबीस साल के आसपास है जो एक एथलीट के रिटायर्ड होने की उम्र होती है। इस ट्रायल से पहले इस वास्तविकता पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।

क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि सुखांत की बजाय दुखांत वाली इस परिणति की वजह क्या रही? नक्कारखाने में बैठे तमाम जिम्मेदारों को किसी ने भी आगाह नहीं कराया कि कम से कम एक बार तो उस वीडियो की सच्चाई परख ली जाए, जिसके दम पर गुर्जर की अपुष्ट कहानियों को उसकी रफ्तार से भी अधिक वाले पंख लगाकर प्रचारित किया गया था। व्हाट्सएप इंडस्ट्रीज के इस खेल में बहुत मुमकिन था यह वीडियो ही बता देता कि मामला वैसा नहीं है, जैसा दिखाया जा रहा है। हमारा मंतव्य गुर्जर या उसके साथियों पर फर्जी वीडियो बनाने की तोहमत लगाने का नहीं है। ऐसे मामले में समय की गणना में भी गलती की गुंजाइश होती है। उद्देश्य इस वीडियो के संदिग्ध पक्ष को सामने लाने का है। फिर ऐसा चाहे किसी ने भी और किसी भी मकसद से ऐसा क्यों न किया हो।

अपेक्षाओं का बोझ रामेश्वर तो क्या लगभग सभी के लिए असहनीय हो जाता है। गुर्जर भी शायद इसके शिकार हो गये। उन पर देश-भर से ऐसी-ऐसी उम्मीदें लगा दी गयीं कि कस्बाई पृष्ठभूमि का यह युवा उनके वजन तले दब गया था। कहा जा रहा है कि पहली बार जूते पहनकर दौड़ने के चलते रामेश्वर सही तरीके से अपना करतब नहीं दिखा सके। मेरे खयाल से तो उनके पैर में जूते नहीं, बल्कि उन अनदीखी बेड़ियों ने जंग लगा दी, जो कुछ अच्छा होने से पहले ही उसे बहुत ही ज्याादा अच्छा बताने की होड़ में तारीफों और उम्मीदों के जरिये उसे पहना दी गयी थीं। रामेश्वर की उम्र उसके दावे के पक्ष में नहीं है लेकिन अगर उसे फिर भी आजमाना ही था तो कम से कम उसकी अनगढ़ प्रतिभा को निखारने के प्रयास सबसे पहले होने चाहिए थे। उसे दक्ष व्यक्ति द्वारा पूरी ट्रेनिंग दिलायी जाती। रफ्तार को प्रतियोगिता में भी कायम रखने के गुर बताये जाते। पैरों की गति को कायम रखते हुए उनमें उत्तरोत्तर तेजी का सबक सिखाया जाता। यह होता तो बहुत मुमकिन है कि वह नहीं होता, जो कल टीटी नगर स्टेडियम में हुआ। रामेश्वर का हश्र उस रबर के गुड्डे जैसा हुआ, जिसे खींच-तानकर बड़ा कर दिया गया और इसके चलते उसका न सिर्फ स्वरूप बिगड़ा, बल्कि उसके मूल रूप में वापस आने की भी कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गयी। वो लौट गया है फिर अपनी दुनिया में।
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News Digital India 18

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