INDORE EYE HOSPITAL का आँखफोड़वा काण्ड, जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई हो

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इंदौर आई अस्पताल में मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद 11 लोगों की आँखों की रोशनी धूमिल हो गई. 1 मरीज की आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई. मामले में सरकार ने कड़ा रवैया अपनाते हुए अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने के साथ ही ओटी को सील करवा दिया है. जांच के लिए एक सात सदस्यीय कमेटी भी गठित की गई है, लेकिन उनका क्या जो अब एक-दूसरे का आसरा बने हुए हैं. उन्हें चिंता यह सता रही है कि रोशनी वापस लौटेगी कि नहीं. घटना ने एक बार फिर से अस्पतालों और चिकित्सकों की लापरवाही को सार्वजनिक किया है. प्रश्न तो यह उठता है कि आखिर इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या उन सभी जिम्मेदारों पर कोई सख्त कार्रवाई होगी? या कुछ लोगों के निलंबित कर कुछ दिन बाद बहाल कर उन लोगों को फिर से लोगों को अंधा करने का लाइसेंस दे दिया जाएगा? इंदौर आई हॉस्पिटल में दिसंबर 2010 में भी मोतियाबिंद के ऑपरेशन फेल होने के बाद 18 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई थी.




संजय सक्सेना 
राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम के तहत पिछले आठ अगस्त को इंदौर नेत्र चिकित्सालय में चौदह मरीजों ने मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाया था, जिनमें से ग्यारह मरीजों के ऑपरेशन फेल हो गए. मामला राज्य सरकार की जानकारी में आया, जिसके बाद मरीजों को ताबड़तोड़ धार रोड स्थित चोइथराम नेत्रालय शिफ्ट कर दिया गया. उधर, सरकार के बुलावे पर चेन्नई से इंदौर आए आए नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव रमण की निगरानी में इन मरीजों का उपचार चल रहा है. इनमें से 5 मरीजों को हवाई मार्ग से इलाज के लिए चेन्नई भेजा गया है. 

प्रदेश सरकार ने ताबड़तोड़ तरीके से ऐलान पर ऐलान कर दिए. स्वास्थ्य मंत्री इंदौर के ही रहने वाले हैं, सो उन्होंने विभाग को सक्रिय करते हुए जांच को कहा, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही इस जांच के दौरान भी सामने आई. इन ऑपरेशनों की जानकारी इंदौर के अफसरों को 13 अगस्त को लगी, उसी दिन वे जांच के लिए अस्पताल पहुंच गए. 38 सैंपल ले भी लिए, लेकिन इन्हें जांच के लिए भेजा सात दिन बाद यानी 19 अगस्त को. इसमें भी ओटी का सैंपल तो भेजा ही नहीं गया. 

सीधी बात है, स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने अस्पताल प्रबंधन को बचने का पूरा मौका दिया. विशेषज्ञ बताते हैं कि दो दिन में ओटी का फ्यूमीगेशन भी संभव है. देरी कर अफसरों ने ओटी में इस्तेमाल होने वाले औजार और उपकरण से संक्रमण के निशान मिटाने का भी अवसर जानबूझकर ही दिया, क्योंकि इतनी देरी के बाद किसी प्रकार के बैक्टीरिया का संक्रमण पता करना मुश्किल काम है. साफ बात है कि जांच व रिपोर्ट में लीपापोती होगी तो 
अस्पताल के लिए बचना आसान हो जाएगा. यही तो उन चिकित्सकों को लापरवाही करने के और अवसर देगा. 

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसे गंभीरता से लिया और संक्रमित हुए मरीजों के इलाज का खर्चा उठाने का ऐलान कर दिया, जबकि इंदौर के चोइथराम अस्पताल और चेन्नई के शंकर नेत्रालय प्रबंधन द्वारायह निर्णय लिया गया कि किसी भी मरीज से उपचार का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. राज्य सरकार से भी कोई शुल्क नहीं लेंगे. कुल पांच रोगियों को शंकर नेत्रालय भेजा गया है, लेकिन एक रोगी मोहनलाल की आंख को फिर भी बचाया नहीं जा सका है.

विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों की आंख में स्यूडोमोनस बैक्टीरिया का घातक संक्रमण हुआ है. उन्होंने संदेह जताया कि मोतियाबिंद ऑपरेशनों के दौरान या इनके बाद के इलाज के दौरान प्रयुक्त किसी द्रव या अन्य तरल पदार्थ के कारण यह संक्रमण हुआ. सीधी सी बात है, कहीं न कहीं चिकित्सकों या उनके स्टाफ की ओर से गंभीर लापरवाही हुई है. इस लापरवाही के लिए किसी को तो जिम्मेदार ठहराया ही जाएगा. परंतु इसके पहले ही जांच के लिए पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने बाकायदा इतनी व्यवस्था कर दी कि उन डाक्टरों को आसानी से बचाया जा सकेगा. 

संक्रमण के सबूत तत्काल लिए जाने चाहिए, पर विभाग ने उसमें भी काफी समय ले लिया. अब स्वास्थ्य मंत्री को पहले अपने विभाग के अधिकारियों पर इस लापरवाही या जानबूझकर की गई गलती के लिए कार्रवाई करनी चाहिए. सभी डाक्टरों को निलंबित करना तो पहला काम हो. इसके बाद जिनकी लापरवाही सामने आए, चाहे डाक्टर हों या उनके स्टाफ के लोग, उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण ही दर्ज होना चाहिए. क्या आम आदमी की कोई कीमत ही नहीं है? सामान्य रोगियों की आंखों के साथ इस तरह की खिलवाड़ क्यों और कैसे हुई? 

यही वो कारण है कि लोग सरकारी अस्पतालों और उनके शिविरों में इलाज कराने से बचते हैं और डरते भी हैं. जबकि सरकार इन पर अरबों रुपए खर्च कर रही है. तरह-तरह के इलाज की योजनाएं लागू की जा रही हैं. डाक्टरों से लेकर अन्य स्टाफ के वेतनों और सुविधाओं में भी बढ़ोत्तरी की जा रही है, लेकिन ऐसा लगता है मानो सरकारी कर्मचारी मूलत: लापरवाह, उदासीन या कह सकते हैं मक्कार हो गया है. उसे लगता है कि उसकी तनख्वाह देना तो सरकार की मजबूरी है, वह जैसे चाहे वैसे काम करेगा. इस सोच में बदलाव खुद कर्मचारी तो लाने से रहे, सो सरकार को ही सख्ती करनी होगी. ऐसे मामलों में जब तक बड़ी कार्रवाई नहीं होगी, इनकी पुनावृत्ति होती रहेगी.

Such type of surgical camps are more of a disservice than any service to poor. 

After eye surgical camps for cataract surgeries, so called social religious organisations started urology and even cosmetic (plastic) surgical camps. 

Surgery of any kind is a very delicate medical procedure that require multi- angle attention and care that is not possible in such transit camps. Government doesn't provide even the very basic scrub lotion and sterile cotton and gauze. Intra-ocular lenses are procured in bulk from substandard manufacturers at cheapest rate. 

Fumigation of operating theatre is a lousy cumbersome procedure and I can say with some conviction that even this very basic procedure is not followed in medical college hospitals; be it in government or in private sector, because of patients' pressure or economic temptation where all important invasive surgeries are performed day in and day out. And employed doctors prefer a short suspension rather then losing the job. 

Not one is guilty. It's the work culture of this country where everything is taken in normal strides and forgotten next day. Life goes on.


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