'विपक्ष' नहीं 'विरोध की राजनीति' कर रही है कांग्रेस पार्टी




''कांग्रेस में फूट पड़ना और कांग्रेसी नेताओं का नई पार्टी बनाना, आज से पहले भी ऐसा हो चुका है। केवल एक बार ही नहीं बल्कि कई कई बार कांग्रेस के नेताओं ने अपने ही शीर्ष नेतृत्व का विरोध कर, पार्टी से इतर अपनी नई पार्टियों को जन्म दिया है। जिनमें से कुछ सफल रही तो कुछ समय के साथ समाप्त हो गई। लेकिन वर्तमान समय में यदि ऐसा कुछ होता है, तो यह कांग्रेस पार्टी के लिए किसी सदमे से कम नहीं होगा।'' 



भवानी प्रताप सिंह ठाकुर 

एक के बाद एक हार झेलने और अपनी विपक्षी पार्टी भाजपा को अपने प्रयासों में मिल रही लगातार सफलता के बाद, हताश निराश अध्यक्ष हीन कांग्रेस पार्टी बुरी तरह बौखला गई है और उसके नेताओं के वक्तव्य को सुनकर ऐसा प्रतीत होता है की देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस जो सत्ता में रहते हुए अपने विपक्षियों से सहयोग की उम्मीद करती थी आज वही कांग्रेस पार्टी 'विपक्ष' की राजनीति नहीं, अपितु 'विरोध की राजनीति' पर उतर आई है। 

अब कांग्रेस का मकसद सिर्फ और सिर्फ भाजपा का विरोध करना नजर आ रहा है। जिसके लिए कांग्रेस पार्टी लगातार एक के बाद एक छोटी-छोटी बातों को मुद्दा बनाकर सरकार का विरोध करती नजर आ रही है। 

बात तीन तलाक की हो या फिर हाल ही के दिनों में कश्मीर से धारा 370 हटाने के ऐतिहासिक फैसले की, एक ओर जहां भाजपा की धुर विरोधी कही जाने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी एवं आम आदमी पार्टी तक ने इससे राष्ट्रहित का विषय बताकर भाजपा का साथ दिया वहीं कांग्रेस इसका विरोध करती रही। कांग्रेस की ओर से अधीर रंजन, मनोज तिवारी और शशि थरूर सहित कई सांसदों ने इस बिल का विरोध किया। मगर  राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने इस विषय पर खुलकर अपनी बात नहीं कही। 
अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे चुके राहुल गांधी ने केंद्र सरकार के निर्णय पर 24 घंटे बाद अपनी एक मामूली प्रतिक्रिया तो व्यक्त की, किंतु विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया के रूप में राहुल गांधी की यह प्रतिक्रिया, राजनीति शास्त्र के शोधार्थियों के लिए एक रोचक विषय है। जो राहुल गांधी राफेल और नीरव मोदी के नाम पर लगातार सरकार पर वार करते रहे हैं, उन्हीं राहुल गांधी को सरकार का यह फैसला देश हित में है अथवा नहीं, यह प्रतिक्रिया देने में 24 घंटे का समय लग गया।

कांग्रेस द्वारा दूसरे के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना तो पुरानी बात है। लेकिन शायद अब की बार चुना हुआ कंधा उतना मजबूत नहीं निकला, इसीलिए तो देश की संसद में कांग्रेस अपने ही बयानों में घिर गई। जिसके बाद धारा 370 को लेकर चल रही चर्चा के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी को अच्छी खासी फजीहत भी झेलनी पड़ी है। संसद में कांग्रेस नेता अधिर रंजन के बयान पर जहां गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस को अपना स्टेंड साफ करने की बात कही, तो वही लद्दाख से सांसद जमयांग ने भी कांग्रेस को जमकर लताड़ा।

संसद के भीतर जो हुआ वह तो कांग्रेस के लिए चिंता का विषय था ही, संसद के बाहर भी लगातार इस विरोध की राजनीति के चलते कांग्रेस पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। कांग्रेस के भीतर मतभेद नजर आने लगे जिसके चलते कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पार्टी से अलग सरकार के फैसले का समर्थन करते नजर आए हैं।

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह सहित दीपेंद्र हुड्डा, मिलन देवड़ा, जनार्दन द्विवेदी और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कई बड़े नेताओं ने सरकार के फैसले का स्वागत किया। वही असम से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद भुवनेश्वर कलिता ने इसी विरोध की राजनीति और कांग्रेस पार्टी के रुख से नाराज होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कलित अब भाजपा में शामिल हो गए हैं। जिससे भाजपा उच्च सदन राज्यसभा में और मजबूत होने की ओर बढ़ चली है। 

कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के बेटे और देश के माने हुए विद्वान कांग्रेस नेता डॉक्टर कर्ण सिंह के धारा 370 हटाए जाने का समर्थन करने के बाद लगा है। डॉ कर्ण सिंह ने कहा कि मैं धारा 370 को हटाने का समर्थन करता हूँ जिसके बाद कांग्रेस में एक बड़ी फूड सामने आई है।

कांग्रेस की अगुवाई में कुछ विरोधी दल कश्मीर में लगे कर्फ्यू को मुद्दा बनाकर बार-बार सरकार को कोसते नजर आ रहे हैं। लेकिन कश्मीर की घाटी में कर्फ्यू आज पहली बार नहीं लगा है। इससे पहले भी घाटी में अनेकों बार कर्फ्यू लगा है, मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद हुई है। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल जो आज कर्फ्यू का विरोध कर रहे हैं। वो शायद भूल रहा हैं कि घाटी में कर्फ्यू आज से पहले भी लगता रहा और यह दुखद है। लेकिन, इस कर्फ्यू की तुलना उस कर्फ्यू के साथ की जाना बेहद गलत होगा। वर्तमान समय में लगा यह कर्फ्यू उस अंधेरी रात की तरह है, जिस रात के बाद कश्मीर की धरती पर एक स्वर्णिम सवेरा होने वाला है। 
देश के राजनीतिक दल यह बात क्यों नहीं समझते कि आतंकवाद के खौफ से लगे कर्फ्यू में और सुरक्षा के कड़े इंतजाम में कुछ तो फर्क होता है। घाटी में लगा कर्फ्यू घाटी के लोगों को खुली जेल में रखने की तरह नहीं अपितु पड़ोसी मुल्क की किसी नापाक वारदात से निपटने का इंतजाम है। जिसे राजनीतिक दल सरकार के विरोध में एक मुद्दा बनाकर बार-बार घसीट रहे। 
लगातार अपने ही दांव में घिरने के बावजूद भी कांग्रेस पार्टी अपने राजनीतिक हित के लिए आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति खेलने से पीछे हटती नहीं नजर आ रहे हैं। तभी तो कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद शोपिया मे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ लंच कर रहे लोगों को पैसे देकर बुलाए गए लोग बता रहे हैं। धारा 370 हटाने के बाद जिस तरह कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल बौखलाए हुए हैं। उससे एक बात तो साबित हो ही जाती है कि धारा 370 के लागू रहने पर इन राजनीतिक दलों और राजनीतिक परिवारों का कोई ना कोई हित, स्वार्थ तो जरूर सिद्ध हो रहा था। जो अब धारा 370 हटने के बाद नहीं होगा।

धारा 370 ही वो कारण था जिसकी वजह से कुछ राजनेता तमीज और तहजीब भूलकर हाथ जलाने और हाथ काटने तक की बातें किया करते थे। धारा 370 हटाए जाने वाले दिन को को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काला दिन बताने वाले राजनैतिक चेहरे, वास्तव में यह काला दिन भारतीय इतिहास या भारतीय लोकतंत्र में नहीं अपितु, इनके राजनीतिक जीवन का काला दिन है। वह काला दिन जिसके बाद सारे काले कारनामे समाप्त होने वाले हैं। 

वह दौर कुछ और था जब भारतीय राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व शिखर पर था। किंतु पिछले कुछ सालों में कांग्रेस ने काफी हद तक अपनी सियासत की जड़ों को कमजोर किया है। राजनीति में नेतृत्व हीनता की कगार पर खड़ी कांग्रेस पार्टी यदि इसी तरह बार-बार राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर भी अपने निजी स्वार्थ के कारण सरकार का विरोध करती रही, तो संभव यह भी है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस अपने भीतर उत्पन्न हो रहे मतभेदों से पार्टी के भीतर अपने विरोधीयों को जन्म दे दे और उसके कुछ शीर्ष नेता ही पार्टी से किनारा कर बैठे।

यदि भारतीय राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस पार्टी  के इतिहास को एक नजर देखें, तो यह संभावनाएँ और भी प्रबल हो जाती है। क्योंकि भारतीय इतिहास यह बताता है कि कांग्रेस में फूट पड़ना और कांग्रेसी नेताओं का नई पार्टी बनाना, आज से पहले भी ऐसा हो चुका है। केवल एक बार ही नहीं बल्कि कई कई बार कांग्रेस के नेताओं ने अपने ही शीर्ष नेतृत्व का विरोध कर, पार्टी से इतर अपनी नई पार्टियों को जन्म दिया है। जिनमें से कुछ सफल रही तो कुछ समय के साथ समाप्त हो गई। लेकिन वर्तमान समय में यदि ऐसा कुछ होता है, तो यह कांग्रेस पार्टी के लिए किसी सदमे से कम नहीं होगा। 

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