मैं हिजड़ा हूँ


बेशक आप भिखारियों के लिए भीख नहीं दीजिये. वैसे भी यह संगठित Business का रूप बन गया है, लेकिन जब भी कभी हिजड़े #transgendersसे किसी अवसर पर सामना हो तो मदद करने में आगे रहने की कोशिश अवश्य कीजिएगा... 

शारीरिक संरचना में भिन्नता से पीड़ित इस जाति के लिए हाल में कुछ कदम उठे हैं, समाज की सोच में भी बदलाव देखा जा रहा है, लेकिन वह नाकाफी है. अभी भी यही कहा जाएगा कि इस जाति के लिए न ही कुछ ठोस समाज करता है न ही कुछ सरकार..




इस जाति के लिए और ज्यादा युवा कवियत्री कुमारी अर्चना "बिट्टू" की कलम से -   

मैं हिजड़ा हूँ





मैं हिजड़ा हूँ
लोग मुझे कई पुकारू नामों से बुलाते हैं 
हिजड़ा, किन्नर, छक्का
चाहे मेरा नाम कुछ भी हो
ना मैं नर हूँ
ना मादा हूँ
दोनों के बीच का हूँ
पर थोड़ी थोड़ी मेरी शक्ल
मानव जैसी दिखती है!

तुम्हारी खुशी में हँसता हूँ
तुम्हारे गम में रोता हूँ
तुम जो देते हो
वही मेरा सब कुछ है
मेरा अपना कुछ भी नहीं
ना मैं ना मेरा जीवन
इसलिए कभी स्त्री तो
कभी पुरूष बनता हूँ
गली कूच्चों में बख्शिश माँगा करता हूँ
उत्सवों में नाचता गाता हूँ
बंदरों जैसा
और तुम नचाते हो मदारी जैसा
रातों को रेड लाइट एरिया को जगमगाता हूँ!

मैं कभी संतति नहीं कर सकता 
इसलिए ना कोई मेरा है
ना पराया है
जन्म तो मैंने भी माँ की कोख से लिया है
पर नाजायज जैसा मुझे फेंक दिया जाता 
दूसरों के रहमों करम पे
एक घर से दूसरे घर
दर दर भटकता हुआ
एक दिन मर जाता हूँ
लवारिस जैसा
पर मेरी मौत पर लोग रोते नहीं
हंसते हैं....
हिजड़ा मर गया!

चलो अच्छा हुआ बेचारे को मुक्ति मिल गयी
ना अपना कोई आँसू बहाता
मेरी लाश पर
ना कोई मेरी अर्थी को कांधा देता
देखो! क्या किस्मत पायी है मैंने?
ना जीते जी अपना कोई याद करता
ना मरने के बाद
अब मुझे तृतीय लिंग मान लिया गया
और पिछड़ा वर्ग के दर्जा से नवाज कर
अब समाज में मुझे यही नई पहचान मिली है
शिक्षा और नौकरियों में
पिछड़ा वर्ग का आरक्षण है
पर कानून तो कागजों पर लागू रह जाते
मुझे तो समाज में सामान्य आदमी
बने रहने का हक़ चाहिए
क्या ये हक़ देंगे मुझे आप?


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