होठों पर स्थायी मुस्कान के लिए 'संतुष्टि' से मिलिये


''किसी रोते हुए बच्चे को हँसाने में मिलने वाली खुशी हो या किसी भूखे को भोजन कराने के बाद मिलती संतुष्टि हो, वही सच्ची खुशी है. मुस्कान अगर खुद के होठों पर स्थायी रखनी है तो संतुष्टि से मिलिये. संतुष्टि को अपने घर में अपने जीवन में जगह दे दीजिए और फिर देखिए वो अपने सौदर्य से आप को मोह लेगी और आपके जीवन में प्रविष्ट होकर आप के चेहरे को हमेशा के लिए खिला देगी. होता यह है कि हम खुशी की चाहत में बाहरी दुनिया में भटकते रहते हैं, जो बाहर तो कहीं है ही नहीं.''



भावना भट्ट 

ब भी जीवन को देखती हूँ वो चाहे अपना हो या अन्य का, एक आश्चर्य प्रविष्ट हो जाता है मुझमें. सुबह से शाम तक अथक चल रही यह दौड़ तो कभी थमती ही नहीं. सुबह से शाम तक बिजी ही रहते लोगों को देखकर आँखें करुणा से भर जाती हैं. सवाल उठता है वो सब सच में बिजी हैं या बिजी होने का ढोंग कर रहे हैं या फिर किसी तनाव से ग्रसित होकर खुद को और बिजी रखने में जुटे हुए हैं?

सच कहुँ तो हम सब अर्थ प्रधान हो गए हैं, मगर जीवन के अर्थ से कोसों दूर हैं. केवल धन नाम के शब्द को पकड़कर उस शब्द के वास्तविक अर्थ और शब्द की अभिव्यंजना से बहुत दूर.. बहुत दूर निकल चुके हैं. 

हमारे ऋषि-मुनियों ने धनी किसको कहा है जरा देखें, जिन के पास संतुष्टि है, वही सच्चा धनी है. कवि रसखान जी ने कहा है 
गोधन गजधन बाजिधन और रतनधन खान,
जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान.

संत कबीर जी ने अपने दोहे में भी यही बात बताई है.
जो जल बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम,
दोऊ हाथ उलीचिये, यही सज्जन कौ काम.

वैसे शब्दों से कहा जाय या फिर जो प्रचलित व्याख्या से समझा जाय तो जिनके पास लक्ष्मी है वही धनवान है. हमारे शास्त्रों में लक्ष्मी के आठ प्रकार दर्शाये गये हैं- आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, धैर्यलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, विजय लक्ष्मी और राजलक्ष्मी. इसके अलावा कहीं-कहीं पर और नाम भी बताये गए हैं. मगर इतना ही सच है कि  जिनके पास यह आठों लक्ष्मी हैं, वही वास्तव में धनी है. इसे थोड़ा पृथक-पृथक देखें तो आदिलक्ष्मी माने हमारे आरंभ का, हमारे मूल का ज्ञान, हम समय के यह विस्तृत अंतराल में पहले कहाँ थे? कहाँ से आये हैं, और कहाँ जायेंगें? इस बात का विचार और इस बात का उत्तर जिन के पास है वो ही धनी. मतलब जो ज्ञानवान है, वो ही धनवान है.

धनलक्ष्मी माने जिनके पास धन है वो धनी, मगर यहाँ पर धन की पर्याप्तता कितनी है, उसका उल्लेख नहीं हुआ, इसीलिए हमने शब्द पकड़ लिया, जहाँ तक गिनती आती है वहाँ तक और उसके भी आगे तक पैसे होने से ही हम धनी हैं, ऐसा मानने लगे, मगर वास्तव में धनी है क्या? पल भर सोचें कि आज से कुछ साल पहले हमारे पास जो धन था और आज जो धन है, वो पहले से अधिक है न..! मगर मन की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है और आगे भी ऐसे ही रहेगी, चाहे कितना भी धन कमा लो.

संक्षिप्त में देखें तो जिनके पास अपने मूल का ज्ञान है, पर्याप्त धन-संपत्ति है, सही-झूंठ की पहचान कराने वाली विद्या है, खाने के लिए धान्य है, संस्कारी संतान है, जीवन में धैर्य है और सबसे बड़ी बात जिनके पास संतुष्टि है वही सच्चा धनी है. उसे ही हर कार्य में सफलता मिलती है. 

बहुत भाग्यशाली लोगों के पास यह समझ होती है कि केवल पैसे कमाकर बैंक में रखने से जीवन का आनंद नहीं मिलता. उसे सही जगह पर खर्च करना भी आना चाहिए. केवल धान्य से कोठरी भरने से आनंद नहीं मिलता. उसी धान्य को किसी जरूरत मंद के पेट की भूख शांत के लिए खर्च करना भी आना चाहिए, पर विडंबना यही है कि हम आदान के पास ही रुके हुए हैं, प्रदान का पता भूल गये हैं. इसीलिए केवल मैं और मेरा, दो ही बातें सोचकर हम वास्तव में सुख नामक छलावे में कैद होकर सुख की सांसें लेना ही चूक रहे हैं. हम कहाँ जा रहे है और क्यूँ? इस बात का जवाब शायद ही किसी के पास हो..!

तनिक ठहरकर हम देखें कि क्या हमने जो कमाया उसे भोग पाने का समय या धैर्य है हमारे पास? सब कुछ होने के बावजूद जो जीवन में धैर्य न हो, संतुष्टि न हो तो वो धन किस काम का?

सालों तक बस पैसे कमाने के लिए दौड़ते रहते हैं, और जीवन का आखरी हिस्सा डॉक्टरों के घर के चक्कर काटने में व्यतीत करते रहेंगे. खूब कमाया मगर आखिर क्या पाया? जीवन से असंतोष, दुःख और तनाव ही... न ! ऐसे लाखों चेहरे हमारे आसपास घूमते हुए हमें मिल जायेंगे, जिनके चेहरे पर केवल तनाव ही देखने को मिलेगा, वो धनवान तो हो सकते हैं, मगर धनी नहीं, क्योंकि जीवन का सर्वश्रेष्ठ सौंदर्य प्रसाधन है संतुष्टि.

बहुत ज्यादा की चाह हमें थका देती है, और दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई लालसा अपने साथ लोभ, क्रोध, अहंकार, और भय को भी लेकर हमारे जीवन में चली आती है. वो हमें अपनों से या कभी अपने आप से भी दूर कर देती है. हम बाहरी दुनिया में भटकते रहते हैं, उस खुशी की चाहत में जो बाहर तो कहीं है ही नहीं.

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाने में मिलने वाली खुशी हो या किसी भूखे को भोजन कराने के बाद मिलती संतुष्टि हो वही सच्ची खुशी है. मुस्कान अगर खुद के होठों पर स्थायी रखनी है तो संतुष्टि से मिलिये. संतुष्टि को अपने घर में अपने जीवन में जगह दे दीजिए और फिर देखिए वो अपने सौदर्य से आप को मोह लेगी और आपके जीवन में प्रविष्ट होकर आप के चेहरे को हमेशा के लिए खिला देगी. 

मगर उस संतुष्टि को कहाँ ढूंढे..? आओ पल भर बैठें बुजुर्गों के पास, उनके अनुभवों को सुनें, उनके जीवन की यात्रा के साथ खुद की जीवनयात्रा को भी जोड़कर देखें. काफी कुछ निस्तारित होगा. आओ कुछ पल चुपचाप बैठें, उन घने पेड़ों की छाँव में, प्रकृति की गोद में, या फिर खुद के साथ रहकर बातें करें खुद के साथ. जीवन की खुशी के उन रहस्यों को उद्घाटित होने में देर नहीं लगेगी. वास्तव में तो जो मिला है, वही उचित है और वही पर्याप्त है.

यही तो है जीवन में खुशी का मूल मँत्र 'प्राप्त ही पर्याप्त है'.



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4 comments:

  1. बहुत सुंदर लेख के लिए बधाई - पंकज त्रिवेदी

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  2. धन्यवाद पंकज जी

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  3. बेहतरीन लेख ������

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