पॉटी चड्ढा के "गिफ्ट" से मोदी की गिरफ्त में मायावती


मोदी सरकार मायावती पर शिकंजा कसने का कोई अवसर छोड़ती नजर नहीं आ रही है। फिलहाल गठबंधन से दूर होते ही मायावती का मुश्किलों का कठिन सफर शुरू हो गया है। सूत्रों की मानें तो सीबीआई के ठंडे बस्ते में पड़ी मायावती कार्यकाल की चीनी मिलों के नियम विरुद्ध आवंटन की फाइल पर चढ़ी धूल की गर्द सफा कर दी गयी है। इस मामले में जल्द ही केन्द्र सरकार मायावती पर सख्त कार्यवाही कर सकती है।




आकाश नागर 

याद रहे कि पॉटी चड्ढा के पुत्र मॉटी चड्ढा की 100 करोड के फर्जीवाडे में हुई गिरफ्तारी के बाद केन्द्र सरकार वेव ग्रुप से जुड़े तमाम मामलों को सामने लाने की तैयारी कर रही है। चीनी मिलो के नियम विरुद्ध आवंटन मे वह पॉटी चड्ढा के साथ ही मायावती पर कार्यवाही करके एक तीर से दो निशाने साधेगी।

गौरतलब है कि वर्ष 2009 से चीनी मिलों के विनिवेश के लिए इनके मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू की गई थी। यहा यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में तीन प्रकार की चीनी मिलों हैं। सरकारी, प्राइवेट, और कोआपरेटिव। शुगर कॉरपोरेशन की 35, शुगर फेडरेशन की 28 और 93 प्राइवेट मिलें हैं।

शुगर कॉरपोरेशन तब अस्तित्व में आया जब काफी चीनी मिलो घाटे में थीं। सन 1971 से 1989 के बीच में उन्हें राष्ट्रीयकृत किया गया। पिछले कई सालों से उत्तर प्रदेश शुगर कॉरपोरेशन की चीनी मिलें घाटे में चल रही थीं। राज्य की तत्कालीन बसपा सरकार ने इसमें अपना निजी स्वार्थ साधने की नीयत से और अवैध लाभ कमाने के लिए इन चीनी मिलों को औने-पौने दामों में बेचना शुरू कर दिया।

शुरुआती बोली का दौर दिल्ली में सम्पन्न कराया गया। उस दौर में चीनी उद्योग से जुड़े कुछ बड़े नाम जैसे बिरला शुगर, डालमियां ग्रुप, सिम्बोली शुगर, धामपुर शुगर, द्वारिका शुगर, उत्तम शुगर, त्रिवेणी शुगर और मोदी शुगर ने बोली में भाग लिया। लेकिन इण्डियन पोटास और वेव इण्डस्ट्री को छोड़कर बाकी शेष बड़े नामों ने खुद को बोली से अलग कर लिया।

तब आरोप लगा की बसपा सरकार ने सुनियोजित तरीके से अपने चहेते उद्यमी ग्रुप वेव जिसके पास इससे पहले तक केवल एक चीनी मिल थी, उसी की फंट्र कम्पनीज के पक्ष में नीलामी स्वीकार की। जो नीलामी की गई, उसमें जो बोली लगाई गई या लगवाई गई वह दिखावा मात्र थी। क्योंकि चीनी मीलों की जमीन की कीमत से भी कम बोली लगी थी।

आरोप है कि बाकी बोली लगाने वाले जिन्होंने पहले हिस्सा लिया था उनको नीलामी में भाग लेने से रोका गया। जरूरत से कम दामों में बोली लगाने से कुछ खास चहेतों को लाभ पहुंचाकर बोली के न्यूनतम मूल्य से कम की बोली लगवाई गई। जमीन का दाम न के बराबर लगाया गया था।

इतना ही नहीं बल्कि उस मिल की मशीनें, भवन, रॉ-मेटेरियल्स तथा आवासीय परिसर की सुविधाओं को भी ध्यान में नहीं रखा गया। उनका मूल्य भी नहीं के बराबर लगाया गया। डिस्काउंट कैश फ्लो मेथड के जरिए इनके मूल्य का आकलन किया गया। इस तरीके से बोली की शुरुआत ही कम कीमत से हुई। और चीनी मिल अपारदर्शी ढंग से बेची गईं। सर्वविदित है कि यह मामला सीएजी की आडिट रिपोर्ट के बाद सामने आया था।

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