भूमिगत जल का गिरता स्तर, कैसे बचा जा सकता है इससे?

Image may contain: 5 people, people sitting and indoor





तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता औद्योगिकीकरण, फैलते शहरीकरण के अलावा ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन भी इसके लिये जिम्मेदार है.
-डॉ अरविंद जैन भोपाल

सन 1901 में हुई प्रथम जनगणना के समय भारत की जनसंख्या 23.8 करोड़ थी जो सन 1947 यानी स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बढ़कर 400 करोड़ हो गई. सन 2001 में भारत की जनसंख्या 103 करोड़ थी. इस समय देश की जनसंख्या 130 करोड़ (1.30 अरब) है. एक अनुमान के अनुसार सन 2025 तक भारत की जनसंख्या 139 करोड़ तथा सन 2050 तक 165 करोड़ तक पहुँच जाएगी. इस बढ़ती जनसंख्या का पेयजल खासकर भूमिगत जल पर जबर्दस्त दबाव पड़ेगा.

बढ़ती आबादी के कारण जहाँ जल की आवश्यकता बढ़ी है वहीं प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता भी समय के साथ कम होती जा रही है. कुल आकलनों के अनुसार सन 2000 में जल की आवश्यकता 750 अरब घन मीटर (घन किलोमीटर) यानी 750 जीसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) थी. सन 2025 तक जल की यह आवश्यकता 1050 जीसीएस तथा सन 2050 तक 1180 बीसीएम तक बढ़ जाएगी. स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में प्रति व्यक्ति जल की औसत उपलब्धता 5000 घन मीटर प्रति वर्ष थी. सन 2000 में यह घटकर 2000 घन मीटर प्रतिवर्ष रह गई. सन 2050 तक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1000 घन मीटर प्रतिवर्ष से भी कम हो जाने की सम्भावना है.

स्पष्ट है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की उपलब्धता कम हो जाने के चलते भूमिगत जल पर भी दबाव बढ़ा जिसका परिणाम इसके गिरते स्तर के रूप में सामने आया.

बढ़ते औद्योगिकीकरण तथा गाँवों से शहरों की ओर तेजी से पलायन तथा फैलते शहरीकरण ने भी अन्य जलस्रोतों के साथ भूमिगत जलस्रोत पर भी दबाव उत्पन्न किया है. भूमिगत जल-स्तर के तेजी से गिरने के पीछे ये सभी कारक भी जिम्मेदार रहे हैं.

जल प्रदूषण की समस्या ने बोतलबन्द जल की संस्कृति को जन्म दिया. बोतलबन्द जल बेचने वाली कम्पनियाँ भूमिगत जल का जमकर दोहन करती हैं. नतीजतन, भूजल-स्तर में गिरावट आती है. गौरतलब है कि भारत बोतलबन्द पानी का दसवाँ बड़ा उपभोक्ता है. हमारे देश में प्रति व्यक्ति बोतलबन्द पानी की खपत पाँच लीटर सालाना है जबकि वैश्विक औसत 24 है. देश में सन 2013 तक बोतलबन्द जल का कारोबार 60 अरब रुपये था. सन 2018 तक इसके 160 अरब हो जाने का अनुमान है.

पहले तालाब बहुत होते थे जिनकी परम्परा अब लगभग समाप्त हो चुकी है. इन तालाबों का जल भूगर्भ में समाहित होकर भूजल को संवर्द्धित करने का कार्य करता था. लेकिन, बदलते समय के साथ लोगों में भूमि और धन-सम्पत्ति के प्रति लालच बढ़ा जिसने तालाबों को नष्ट करने का काम किया. वैसे वर्षा का क्रम बिगड़ने से भी काफी तालाब सूख गए. रही-सही कसर भू-माफियाओं ने पूरी कर दी. उन्होंने तालाबों को पाटकर उन पर बड़े-बड़े भवन खड़े कर दिए अथवा कृषिफार्म बना डाले.

धरातल से विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल के भूगर्भ में पहुँचने के कारण ही भूजल की सृष्टि होती है. इन स्रोतों में एक है वर्षा का जल जो पाराम्य शैलों से होकर रिस-रिसकर अन्दर पहुँचता है. शैल रंध्रों में भी जल एकत्रित होता है. जब कोई शैल पूर्णतया जल से भर जाती है तो उसे संतृप्त शैल कहते हैं. शैल रंध्रों के बन्द हो जाने से जल रिसकर नीचे नहीं जा पाता है. इस प्रकार जल नीचे न रिसने के कारण जल एकत्रित हो जाता है. यही एकत्रित जल जलभृत यानी एक्विफर कहलाता है.

Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc