सुनो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आयेंगे, जिससे है सम्पूर्ण जगत का अस्तित्व वही भयाक्रांत और डर के साये में



''एक महिला ही है, जिससे न सिर्फ पुरुष का बल्कि सम्पूर्ण जगत का अस्तित्व है और देश की संस्कृति भी उसी पर टिकी है, अगर वो भयाक्रांत होगी और डर के साये में जियेगी, तो सब कुछ समाप्त होना तय है. ऐसे में 'छोड़ो मेहंदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो, द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे, सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे.' किसी कवि की उक्त पंक्तियां महिलाओं की हक़ीक़त बयां करने के लिए सटीक बैठती हैं.''




सचिन आर.पांडेय

ड़ीसा का टेल्को थाना, जहाँ एक छोटी बच्ची के साथ 4 पुलिस वालों ने बलात्कार किया, अभी कुछ दिन ही हुए हैं, और कही कोई कैंडिल मार्च तक नहीं है. 

अभी कुछ दिन पहले चुनाव की बढ़ती गर्मी ने एक मासूम की आवाज़ का और उसकी चीखों का गला घोंट दिया, जबकि उसके साथ भी बलात्कार किया गया, वो भी उसके अभिभावकों के सामने.

ये नये जमाने का हिंदुस्तान है साहब. यहां आप आदत डालिये, इन खबरों को सुनने की. आंकड़ों  के मुताबिक हर मिनट यहॉ या तो छेड़खानी होती है या बलात्कार.

अभी कुछ दिन पहले बिहार के एक जिले में बालिका संरक्षण गृह में यौन शोषण का मामला आया था और जघन्यतम कृत्य करने वाला अपराधी हँसता-मुस्कुराता पुलिस द्वारा ले जाया जा रहा था.

उसकी हंसी अनायास नहीं थी. मेरे ख्याल से वो तो उपहास कर रहा था, भारत की लंबी कानून प्रक्रिया पर, निकम्मी पुलिस प्रणाली पर और देश के अंधे कानून और कानून के दलालो पर!

अभी कुछ दिन पहले ipc में व्यापक संसोधन किये गए हैं और सजा के प्रावधान भी कठोर किये गए हैं, लेकिन हालात नहीं बदले हैं. आये दिन देश के किसी न किसी कोने से खबर आ ही जाती है कि अपराध किया गया.

जिस देश की संस्कृति और विरासत ही "या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता" जैसे श्लोक पर आधारित हो और जहां साल में चार नवरात्रियां, जिनमें से दो विशेष रूप से वन्दनीय हैं, वहां हाल ये है. स्थिति सोचनीय है! 

'छोड़ो मेहंदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो, द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे, सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे.' किसी कवि की उक्त पंक्तियां आधुनिक परिवेश में महिलाओं की हक़ीक़त बयां करने के लिए सटीक बैठती हैं. जो भारत कभी ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः'' की विचारधारा पर चलायमान था, आज हालात यह हैं कि वो भारत महिलाओं पर अत्याचार के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बन गया है.

आने वाले समय में भारत नये मुकाम को हासिल करेगा और विश्व पटल पर हर तरह भारत की ही धूम होगी, लेकिन अफ़सोस है और दुःख भी कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति में महिलाएं और बच्चियां सुरक्षित नहीं होंगी!

देश का कानून बदला जा सकता है, लेकिन मेरे ख्याल से इन मामलों के लिए एक स्पेशल इंविस्टिगेटिंग एजेंसी होनी चाहिए और फास्ट ट्रैक कोर्ट भी, जहां एक निर्धारित समय सीमा में फैसला दिया जाये. साथ ही साथ अपील से लेकर क्षमा याचिका का भी समय निर्धारित हो.

दंड इसलिए है, ताकि समाज में एक संदेश जाये और लोग फिर उस अपराध को करने के पहले सोचें और हज़ार बार उस अंजाम को सोचें, जो उनके जघन्य कृत्य की अंतिम परिणति है.

इतना कर देने मात्र से समस्या समाप्त नहीं होने वाली, क्योंकि इस अपराध की जड़ें काफी गहरी हैं. देश की विधायिका को, देश के लोगों को और देश की सबसे बड़ी अदालत को अश्लील विज्ञापनों, अंतरंग प्रदर्शनों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए. 

हमारी संस्कृति में स्त्री का दर्जा देवी का है जिसके सामने सर श्रद्धा से झुक जाता है ,उस वर्ग को भी अपनी देवी तुल्य मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए और किसी भी अंग-प्रदर्शन करने वाले विज्ञापनों से और चलचित्रों से बचना चाहिए. मेरे ख्याल से ये आप की नैतिक जिम्मेदारी है.

देश के युवा को इस मामले पर न सिर्फ गम्भीर होना होगा, बल्कि थोड़ी सम्वेदनशीलता भी जरूरी है. आप का दायित्व है किसी भी ऐसी छेड़खानी का पुरजोर विरोध करना, क्योंकि आखिर है तो आप भी किसी बहन के भाई ही और भविष्य में किसी बिटिया के बाप.

कुछ चीज़ें हैं, जो बड़ा बदलाव ला सकती है कानून, पुलिस, अदालत अपना काम तय समय पर और ईमानदारी से करें और देश की जनता अपने दायित्वों का पालन करे तो शायद कुछ हद तक हालात बदले जा सकेंगे.

एक महिला ही है, जिससे न सिर्फ पुरुष का बल्कि सम्पूर्ण जगत का अस्तित्व है और देश की संस्कृति भी उसी पर टिकी है, अगर वो भयाक्रांत होगी और डर के साये में जियेगी, तो सब कुछ समाप्त होना तय है.

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