कोई भी पंछी एक पंख से उड़ नहीं सकता


विशेष टिप्पणी / क्या हैं मोदी जी की जीत के मायने?

देश में प्रजातंत्र के कारण बिना खूनी हिंसा के सत्ता का हस्तांतरण हो जाता है. और प्रजातंत्र में जीत सदैव साथ नहीं रहती, हार भी बहुत मायने रखती है, क्योंकि उसी से जीत का महत्व है, सो संभव हो तो कोई मनभिन्नता के साथ कार्य नहीं करियेगा, अन्यथा यह भारत की जनता है... क्योंकि बिना विपक्ष के सत्ता के निरकुंश हो जाने की संभावना बनी रहती है. ध्यान रखना होगा कि आज देश और देश के लोग खूब ऊंचा उड़ना चाहते हैं और वह एक पंख से तो उड़ नहीं सकते. 



डॉ. अरविन्द जैन, भोपाल 

मोदी जी की जीत की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार द्वारा निरन्तर बाह्य मतभेद बनाये गए और वे निरंतर एक दूसरे के पूरक रहे, यानि वे दिन के दो और रात के एक रहे, जबकि विपक्ष एक के एक और रात में अलग लग रहे. पार्टी, प्रत्याशी के लिए चुनाव न लड़कर मोदी व्यक्ति के लिए चुनाव लड़े. चुनाव लड़ना और उसका प्रबंधन करना दोनों अलग अलग  बात हैं, पर इस बार दोनों का भरपूर उपयोग किया गया. इस बार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने मुद्दों पर चुनाव न लड़कर व्यक्तिवाद पर चुनाव लड़ा. मोदी जी सुबह से रात तक अपना भाषण गाँधी नेहरू से शुरू कर अंत उसी पर करते थे. उन्होंने नौकरी, बेरोजगारी, किसान की समस्याओं पर कोई अपना दृष्टिकोण रखा. और उन्होंने और पार्टी ने एक जुट होकर संघर्ष किया और उसका प्रतिफल उनकी विजय हुई, जिसकी अपेक्षा नहीं थी पर मिली. 

उन्होंने आज अपने उद्बोधन में बहुत अच्छी बात कही कि वे केंद्रीय चुनाव आयोग की कार्यशैली से खुश हैं. कई और लोक-लुभावन बातें भी कहीं अच्छा लगा है, पर वैसा हो तो ज्यादा अच्छा लगेगा, जो कि होता दिख नहीं रहा क्योंकि अब पता नहीं तीसरे आयोग की क्या दशा होगी? स्वाभाविक है जो पालतू होगा, उसको मालिक के प्रति वफादार होना होगा. वे अब किसी से बदले की कार्यवाही नहीं करेंगे, पर जो कानून के अंदर आएगा, उसको बख्शा भी नहीं जायेगा, हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं पर नियमानुसार कार्यवाही हो. 

प्रधानमंत्री मोदी जी को उनके कौशलीय विजय और विपक्ष पर प्रचंड सफलता के लिए हार्दिक बधाई. लेकिन साथ ही कहना चाहेंगे जीत कभी साथ नहीं रहती हार भी बहुत महत्व रखती है, क्योंकि उसी से जीत का महत्व है, सो संभव हो तो मनभिन्नता के साथ आप भी कोई कार्य नहीं करियेगा अन्यथा यह भारत की जनता है..., क्योंकि यह देश एक पंछी है, जो खूब ऊंचा उढ़ना चाहता है और कोई भी पंछी एक पंख से उड़ नहीं सकता.  

विपक्ष की बात करें तो लगा जैसे वह तो जीत ही रहा है    
विपक्ष की बात करें तो लगा जैसे वह तो जीत ही रहा है. कोई ख़ास करने की कोई जरूरत नहीं. एक बार की भूल क्षम्य होती है, पर बार बार की गयी भूल अपराध के श्रेणी में मानी जाती है. जब सामने वाला शक्तिशाली, सत्ताशीन हो और उसकी निरंतर कार्य क्षमता बढ़ रही हो, उस समय यदि किसी को हराना हो तो उसके लिए एकता की आवश्यकता होती है. एकता के लिए सबसे पहली शर्त अपना अहम त्यागना, जो कि मानवीय गुणों के प्रतिकूल होने के बाद भी त्यागना आसान नहीं होता है. यही अहम का त्याग नहीं करने के कारण राजा, महाराजा और कांग्रेस के कर्णधार मात खा गए. 

सबसे पहली बात कांग्रेस का आचरण या उसके विरोध में जो भ्रष्टाचार के दाग लगे, उन्हें उसने सक्षमता से सामना न करके बिखरे रहने दिया. दूसरा उनके पास नेतृत्व का अभाव यानि दूसरी पंक्ति की तैयारी नहीं और पार्टी में व्यक्तिवाद होने से आतंरिक विखराव और आपसी मेल मिलाप का अभाव बड़ा कारण रहा. आम जनता और देश से जुड़े कई अहम् मुद्दे नोट बंदी ले लें या देश पर भारी कर्ज थोपने जैसी बात पर कांग्रेस विपक्ष बोलता दिखा ही नहीं. 

दूसरा अन्य पार्टियां जो कि बहुत शक्तिशाली न होने के बाद भी किसी की अधीनता न स्वीकारना और अपना हम सर्वोपरि रखकर बिना आधार के अपने अपने तिलस्मी भवनों में रहकर स्वयं का राजा बनने का अहसास होना, जिस कारण एकता न होना और जिसका फायदा सत्ता पार्टी को उठाना या सत्ता पार्टी के पिट्ठू रहना. कारण सत्ता में न भी आये तो सत्ता से लाभ मिलता रहे. ऐसा क्या कारण है कि आपसी मेल मिलाप किसी एक नेता के साथ न होना. इसका ही परिणाम है कि सत्ता पार्टी ने फुट डालो की नीति का उपयोग कर लाभ उठाया.

चिड़िया चुग गयी खेत     
चिड़िया चुग गयी खेत अब पछताए होत का. अब कुछ दिन दुःख में बिताये और उसके बाद आत्म-चिंतन और आत्म-विश्लेषण करें और समझें. यदि इस विषय पर आगामी चुनाव की रणनीति तैयार करें तो ठीक है और जीतने वाली पार्टी अब और ज़ोरदार तरीके से आगामी चुनाव की तैयारी करेगी. उससे लड़ने के लिए एकता के साथ मतभिन्नता दूर करना होगी. मतभिन्नता होना जरुरी है, पर मनभिन्नता नहीं होना चाहिए, पर मनभिन्नता की खाई इतनी गहरी है कि उस कारण आपस में मिलना कठिन लगता है, जबकि यह नहीं होना चाहिए.

विपक्ष यदि अपना भविष्य बनाना चाहे, तो उसके लिए किसी एक को चुनना ही होगा, जो योग्य हो. उसे अभी से अपना नेता मानकर उसकी रज़ामंदी से काम करेंगे तो भविष्य उज्जवल होगा, अन्यथा भविष्य किसी को कोसते कोसते निकलेगा और प्रचंड बहुमत के कारण जो भी निर्णय लिए जायेंगे वो मान्य होंगे और आप फन मार कर कोसते रहेंगे. प्रजातंत्र में जनता का विश्वास जीतना सरल और कठिन दोनों हैं.

इस संसार में कोई भी किसी का न मित्र हैं और न शत्रु, मेरे द्वारा किये गए कर्म ही मेरे मित्र हैं और मेरे शत्रु. दूसरी बात द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव निम्मित और उपादान की अनुकूलता से सफलता मिलती है, व्यक्ति का पुण्य पाप का ठाठ होने से सुख सफलता मिलती है.
''नामोपलब्धिमात्रेण कार्यसिद्धिः किमिष्यते?
नाम की उपलब्धि मात्र से कार्य की सिद्धि नहीं होती.
अकालसाधनम शौर्य न फलाय प्रकल्पते !''
प्रतिकूल समय में प्रगट की हुई शूरता फलदायी नहीं होती.

''बुद्धिनारग्रेसरी यस्य न निबरन्धः फलतयसौ!
बुद्धिहीन प्रयत्न कभी सफल नहीं होता.''
इसी प्रकार सत्ता पक्ष और विपक्ष की बहुत बड़ी जिम्मेदारियां हैं. उम्मीद करते हैं वह उन्हें पूरा करेंगे.

प्रधानमंत्री मोदी जी को उनके कौशलीय विजय और विपक्ष पर प्रचंड सफलता के लिए हार्दिक बधाई. लेकिन साथ ही कहना चाहेंगे देश में प्रजातंत्र के कारण बिना खूनी हिंसा के सत्ता का हस्तांतरण हो जाता है. और प्रजातंत्र में जीत सदैव साथ नहीं रहती, हार भी बहुत मायने रखती है, क्योंकि उसी से जीत का महत्व है, सो संभव हो तो कोई मनभिन्नता के साथ कार्य नहीं करियेगा, अन्यथा यह भारत की जनता है... क्योंकि बिना विपक्ष के सत्ता के निरकुंश हो जाने की संभावना बनी रहती है. ध्यान रखना होगा कि आज देश और देश के लोग खूब ऊंचा उड़ना चाहते हैं और वह एक पंख से तो उड़ नहीं सकते. 
                      
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