कामसू‍त्र और खजुराहो के मंदिर, दार्शनिक चिंतन, एक अलग तरह की शांति, एक पवित्रता का अनुभव




''ओशो अपने प्रवचन 'संभोग से समाधि की ओर' में कहते हैं कि तंत्र ने सेक्‍स को स्प्रिचुअल बनाने का दुनिया में सबसे पहला प्रयास किया था। खजुराहो में खड़े मंदिर, पुरी और कोणार्क के मंदिर इस बात के सबूत हैं। कभी आपने खजुराहो की मूर्तियां देखी हों तो आपको दो बातें अद्भुत अनुभव होंगी। पहली बात तो यह है कि नग्‍न मैथुन की प्रतिमाओं को देखकर भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि उनमें जरा भी कुछ गंदा है, जरा भी कुछ अश्लील है। दुसरी नग्‍न मैथुन की प्रतिमाओं को देखकर भी एक अलग तरह की शांति, एक पवित्रता का अनुभव होगा, जो बड़ी हैरानी की बात है।''



डॉक्टर अरविन्द जैन    

कामसूत्र की तरह ही खजुराहो के मंदिर भी विश्वप्रसिद्ध हैं, क्योंकि इनकी बाहरी दीवारों में लगे अनेक मनोरम और मोहक मूर्तिशिल्प कामक्रिया के विभिन्न आसनों को दर्शाते हैं। कामसूत्र में एक वैज्ञानिक की दृष्टि से कामभावना और कामकला का अध्ययन और विश्लेषण किया गया है तो उसकी मूल भावनाओं का खजुराहो में चित्रण किया गया है।


मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो का इतिहास काफी पुराना है। खजुराहो का नाम खजुराहो इसलिए पड़ा क्योंकि यहां खजूर के पेड़ों का विशाल बगीचा था। खजिरवाहिला से नाम पड़ा खजुराहो। इब्नबतूता ने इस स्थान को कजारा कहा है, तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भाषा में इसे ‘चि: चि: तौ’ लिखा है। अलबरूनी ने इसे ‘जेजाहुति’ बताया है, जबकि संस्कृत में यह ‘जेजाक भुक्ति’ बोला जाता रहा है। चंद बरदाई की कविताओं में इसे ‘खजूरपुर’ कहा गया तथा एक समय इसे ‘खजूरवाहक’ नाम से भी जाना गया। लोगों का मानना था कि इस समय नगर द्वार पर लगे दो खजूर वृक्षों के कारण यह नाम पड़ा होगा, जो कालांतर में खजुराहो कहलाने लगा।

खजुराहो में वे सभी मैथुनी मूर्तियां अंकित की गई हैं, जो प्राचीनकाल का मानव उन्मुक्त होकर करता था जिसे न ईश्वर का और न धर्मों की नैतिकता का डर था। हालांकि रखरखाव के अभाव में एक ओर जहां ये मूर्तियां जहां नष्ट हो रही हैं, वहीं लगातार इन धरोहरों से मूर्तियों की चोरी की खबरें भी आती रही हैं।

अधिकतर धर्मों ने सेक्स का विरोध कर इसका तिरस्कार ही किया है जिसके चलते इसे अनैतिक और धर्मविरुद्ध कृत्य माना जाता है। धर्म, राज्य और समाज ने स्त्री और पुरुष के बीच के संपर्क को हर तरह से नियंत्रित और सीमित करने के अधिकतर प्रयास किए। इसके पीछे कई कारण थे। इस प्रतिबंध के कारण ही लोग इस पर चर्चा करने और इस पर किसी भी प्रकार की सामग्री पढ़ने, देखने आदि से कतराते हैं लेकिन दूसरों से छिपकर सभी यह कुकृत्य (?) करते हैं। समाज में बलात्कार के कारणों को ढूंढने का कोई प्रयास नहीं करता।


सेक्स न तो रहस्यपूर्ण है और न ही पशुवृत्ति। सेक्स न तो पाप से जुड़ा है और न ही पुण्य से। यह एक सामान्य कृत्य है लेकिन इस पर प्रतिबंध के कारण यह समाज के केंद्र में आ गया है। पशुओं में सेक्स प्रवृत्ति सहज और सामान्य होती है जबकि मानव ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। मांस, मदिरा और मैथुन में कोई दोष नहीं है, दोष है आदमी की प्रवृत्ति और अतृप्ति में। कामसुख एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन मनुष्य ने उसे अस्वाभाविक बना दिया है।

खजुराहो के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कामकला के आसनों में दर्शाए गए स्त्री-पुरुषों के चेहरे पर एक अलौकिक और दैवी आनंद की आभा झलकती है। इसमें जरा भी अश्लीलता या भोंडेपन का आभास नहीं होता। ये मंदिर और इनका मूर्तिशिल्प भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर हैं। इन मंदिरों की इस भव्यता, सुंदरता और प्राचीनता को देखते हुए ही इन्हें विश्व धरोहर में शामिल किया गया है।

खजुराहों में वे सभी मैथुनी मूर्तियां अंकित की गई हैं, जो प्राचीनकाल का मानव उन्मुक्त होकर करता था जिसे न तो ईश्वर का और न ही धर्मों की नैतिकता का डर था। हालांकि इसका मूर्तिशिल्प लक्ष्मण, शिव और पार्वती को समर्पित मंदिरों का अंग है इसलिए इनके धार्मिक महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता।


अब सवाल यह उठता है कि मंदिर जैसी पवित्र जगह पर इस तरह की मैथुनी मूर्तियां क्यों बनाई गईं? क्या इसे बनाते वक्त धर्मगुरुओं ने इसका विरोध नहीं किया? क्या खजुराहो के मंदिरों का तंत्र और कामसूत्र से कोई संबंध है? आखिर कौन-कौन-सी मुद्राओं की यहां पर मूर्तियां हैं। 

कामसूत्र में वर्णित अष्ट मैथुन का सजीव चित्रण खजुराहो के सभी मंदिरों की दीवारों पर जीवंत होना हुआ दिखाई देता है। 22 मंदिरों में से एक कंदारिया महादेव का मंदिर काम शिक्षा के लिए मशहूर है। संभवत: कंदरा के समान प्रतीत होते इसके प्रवेश द्वार के कारण इसका नाम कंदारिया महादेव पड़ा होगा। यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। 117 फुट ऊंचा, लगभग इतना ही लंबा तथा 66 फुट चौड़ा यह मंदिर सप्तरथ शैली में बना है। हालांकि इसके चारों उपमंदिर सदियों पूर्व अपना अस्तित्व खो चुके थे। 

विशालतम मंदिर की बाह्य दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां हैं तो अंदर भी 226 मूर्तियां स्थित हैं। इतनी मूर्तियां शायद अन्य किसी मंदिर में नहीं हैं। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर की बनावट और अलंकरण भी अत्यंत वैभवशाली है। कंदारिया महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार 9 शाखाओं से युक्त है, जिन पर कमल पुष्प, नृत्यमग्न अप्सराएं तथा व्याल आदि बने हैं। सरदल पर शिव की चारमुखी प्रतिमा बनी है। इसके पास ही ब्रह्मा एवं विष्णु भी विराजमान हैं। गर्भगृह में संगमरमर का विशाल शिवलिंग स्थापित है। मंडप की छतों पर भी पाषाण कला के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं। 


इस मंदिर का निर्माण राजा विद्याधर ने मोहम्मद गजनवी को दूसरी बार परास्त करने के बाद 1065 ई. के आसपास करवाया था। बाह्य दीवारों पर सुर-सुंदरी, नर-किन्नर, देवी-देवता व प्रेमी-युगल आदि सुंदर रूपों में अंकित हैं। मध्य की दीवारों पर कुछ अनोखे मैथुन दृश्य चित्रित हैं।

एक स्थान पर ऊपर से नीचे की ओर एक क्रम में बनी ३ मूर्तियां कामसूत्र में वर्णित एक सिद्धांत की अनुकृति कही जाती हैं। इसमें मैथुन क्रिया के आरंभ में आलिंगन व चुंबन के जरिए पूर्ण उत्तेजना प्राप्त करने का महत्व दर्शाया गया है। एक अन्य दृश्य में एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में 3 स्त्रियों के साथ रतिरत नजर आता है।

खजुराहो के मंदिरों के बनाने के अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। एक मत है कि ये मूर्तियां यहां अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के सिद्धांत का हिस्सा हैं। इस विषय में यह भी कहा जाता है कि ये प्रतिमाएं भक्तों के संयम की परीक्षा का माध्यम हैं। मोक्ष के कई मार्गों में से एक है काम। सनातन हिन्दू धर्म ने जिंदगी को 4 पुरुषार्थों के हवाले किया है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। एक-एक सीढ़ी और एक-एक सफलता और इन चारों पुरुषार्थों का समन्वय है खजुराहो के मंदिरों में। 

दूसरा कारण : मंदिर निर्माण के कारणों में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि उक्त काल में बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते गृहस्थ धर्म से विमुख होकर अधिकतर युवा ब्रह्मचर्य और सन्यास की ओर अग्रसर हो रहे थे। उन्हें पुन: गृहस्थ धर्म के प्रति आसक्त करने के लिए ही देशभर में इस तरह के मंदिर बनाए गए और उनके माध्यम से यह दर्शाया गया की गृहस्थ रहकर भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।


तीसरा कारण : कहा जाता है कि चंदेल राजाओं के काल में इस क्षेत्र में तांत्रिक समुदाय की वाममार्गी शाखा का वर्चस्व था, जो योग तथा भोग दोनों को मोक्ष का साधन मानते थे। ये मूर्तियां उनके क्रिया-कलापों की ही देन हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र का आधार भी प्राचीन कामशास्त्र और तंत्रसूत्र है। शास्त्रों के अनुसार संभोग भी मोक्ष प्राप्त करने का एक साधन हो सकता है, लेकिन यह बात सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है, जो सच में ही मुमुक्षु हैं।

बहरहाल, स्थापत्य की इस विधा के मूल में कारण और औचित्य चाहे कुछ भी रहा हो, यह तो निश्चित है कि उस काल की संस्कृति में ऐसी कला का भी महत्वपूर्ण स्थान था।

खजुराहो के मंदिर के निर्माण के संबंध में बुंदेलखंड में एक जनश्रुति प्रचलित है। कहते हैं कि एक बार राजपुरोहित हेमराज की पुत्री हेमवती संध्या की बेला में सरोवर में स्नान करने पहुंची। उस दौरान आकाश में विचरते चंद्रदेव ने जब स्नान करती अति सुंदर और नवयौवना से भीगी हुई हेमवती को देखा तो वे उस पर आसक्त हुए बगैर नहीं रह पाए। उसी पल वे रूपसी हेमवती के समक्ष प्रकट हुए और उससे प्रणय निवेदन किया। कहते हैं कि उनके मधुर संयोग से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसने ही बड़े होकर चंदेल वंश की स्थापना की। समाज के भय से हेमवती ने उस बालक को वन में करणावती नदी के तट पर पाला और उसका नाम चंद्रवर्मन रखा। 


बड़ा होकर चंद्रवर्मन एक प्रभावशाली राजा बना। एक बार उसकी माता हेमवती ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए प्रेरित किया, जो समाज को ऐसा संदेश दें जिससे समाज यह समझ सके कि जीवन के अन्य पहलुओं के समान कामेच्छा भी एक अनिवार्य अंग है और इस इच्छा को पूर्ण करने वाला इंसान कभी पापबोध से ग्रस्त न हो। 

ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए चंद्रवर्मन ने खजुराहो को चुना। इसे अपनी राजधानी बनाकर उसने यहां 85 वेदियों का एक विशाल यज्ञ किया। बाद में इन्हीं वेदियों के स्थान पर 85 मंदिर बनवाए गए थे जिनका निर्माण चंदेल वंश के आगे के राजाओं द्वारा जारी रखा गया। यद्यपि 85 में से आज यहां केवल 22 मंदिर शेष हैं। 14वीं शताब्दी में चंदेलों के खजुराहो से प्रस्थान के साथ ही सृजन का वह दौर खत्म हो गया।

कोणार्क, पुरी, खजुराहो- इन मंदिरों की दीवारों पर मैथुन-मूर्तियां हैं। इन मूर्तियों का संदेश है कि संसार मैथुनमय है। संसार में मन्मथ भाव की प्रधानता है। यह द्वैत में अद्वैत का आनंद देती है। हिन्दू धर्म में काम को कामदेव और कामेश्वर माना गया है। 

धर्म के अनुसार काम करते हुए अर्थोपार्जन और कामोपभोग के बाद मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होने की अवस्था आती है। प्राचीन हिन्दू परंपरा के वाहक ‘रामायण' और ‘महाभारत' में भी काम के प्रति अनेक प्रकार के रुझानों के दर्शन होते हैं। अपनी मूल प्रकृति में हिन्दू धर्म और परंपरा वर्जनावादी नहीं है।

ओशो अपने प्रवचन 'संभोग से समाधि की ओर' में कहते हैं कि तंत्र ने सेक्‍स को स्प्रिचुअल बनाने का दुनिया में सबसे पहला प्रयास किया था। खजुराहो में खड़े मंदिर, पुरी और कोणार्क के मंदिर इस बात के सबूत हैं। कभी आपने खजुराहो की मूर्तियां देखी हों तो आपको दो बातें अद्भुत अनुभव होंगी। 

पहली बात तो यह है कि नग्‍न मैथुन की प्रतिमाओं को देखकर भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि उनमें जरा भी कुछ गंदा है, जरा भी कुछ अश्लील है। दुसरी नग्‍न मैथुन की प्रतिमाओं को देखकर भी एक अलग तरह की शांति, एक पवित्रता का अनुभव होगा, जो बड़ी हैरानी की बात है। वे प्रतिमाएं आध्‍यात्‍मिक सेक्‍स को जिन लोगों ने अनुभव किया था, उन शिल्‍पियों से निर्मित करवाई गई हैं।




Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a comment

abc abc