सहयोगी दलों को ख़त्म करने का काम कर रही BJP, राजभर ने छोड़ दी, 39 सीटों पर घोषित किये उम्मीदवार, मोदी के खिलाफ भी उतारा अपना प्रत्याशी




बीजेपी अपने सहयोगी दलों को ख़त्म करने का काम कर रही है. इसी के तहत सहयोगी दलों को कम सीटें और बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर लड़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है, अन्यथा आवश्यकता नहीं. अब यह फार्मूला सब पर तो लागू नहीं हो सकता सो अब इसी कारण से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता और उत्तरप्रदेश की योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर अब बीजेपी से बागी हो गए हैं. उन्होंने 39 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. 



बीजेपी ने समझौते के तहत अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल को तीन सीटें दे दी हैं. इनमें मिर्जापुर और राबटर्सगंज की सीट से अनुप्रिया की पार्टी अपने चुनाव चिन्ह पर मैदान में है, जबकि प्रतापगढ़ की लोकसभा सीट से अपना दल के विधायक संगम लाल गुप्ता बीजेपी के टिकट पर चुनाव मैदान में है. इसी तरह से भाजपा ने डा. संजय निषाद की निषाद पार्टी से भी एक सीट पर समझौता किया है. समझौते में निषाद पार्टी ने भाजपा में अपना विलय कर लिया है. 

संतकबीर नगर से डा. संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को भाजपा के टिकट पर मैदान में उतारा है. राजभर का मानना है कि उनकी ताकत अपना दल और निषाद पार्टी की तुलना में काफी बड़ी है. उत्तरप्रदेश में राजभर समुदाय के लोग ठीकठाक मात्रा में हैं. कोहार, कुम्हार समेत अन्य जातियों के लोग राजभर की सुहेलदेव पार्टी से जुड़े हैं. ऐसे में राजभर की मांग पहले से ही कम से कम दो सीटों की रही है. इसके अलावा वह अपने उम्मीदवारों को अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़वाना चाहते हैं, ताकि भविष्य में भी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का रास्ता बने रहे.



ओम प्रकाश राजभर उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री रहने के बाद भी राज्य सरकार के खिलाफ बोलते रहे हैं. वह पूर्व में भी कई बार अलग होने की चेतावनी दे चुके हैं. श्री राजभर का कहना है कि राजभर समाज और इससे जुड़ी जातियों जितनी हिस्सेदारी रखती हैं, उतना इन्हें सम्मान नहीं मिल पा रहा है. राजभर अन्य समाज पिछड़ी जातियों में आता है. 

श्री राजभर उत्तरप्रदेश में भाजपा से समझौते में कम से कम दो सीटों की उम्मीद कर रहे थे. उन्हें उम्मीद थी घोसी के अलावा एक और सीट सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को मिलेगी, इतना ही नहीं पार्टी के प्रत्याशी अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे, लेकिन जब ऐसा नहीं हो सका अतो राजभर ने यह कदम उठाया. राजभर साफ़ कह रहे हैं कि समझौते की अब कोई गुंजाइश नहीं है, हालांकि बीजेपी की ओर से डैमेज कंट्रोल की कोशिश अभी भी की जा रही हैं. 

16 वर्ष पुराना संगठन चलाना है न कि सांसद बनना 
पत्रकारों से बातचीत में राजभर ने कहा कि वह इस्तीफा टाइप कराकर रखे हैं और योगी ज्यों मांगेंगे सौंप देंगे. (राजभर ने मंत्री पद और अपने निगम अध्यक्षों का इस्तीफा योगी के निजी सचिव को शनिवार को दिया था, जिसे उन्होंने लेने से इन्कार कर दिया था.) उन्होंने कहा कि भाजपा यह कहती है कि राजभर से विधानसभा चुनाव के लिए समझौता हुआ है लोकसभा के लिए नहीं तो विधानसभा में फिलहाल समझौता बना रहेगा, लोकसभा चुनाव में नहीं. 


उन्होंने कहा कि मेरी इच्छा है कि मैं भाजपा के साथ मिलकर लड़ूं लेकिन, मुझे एक भी सीट नहीं दे रहे हैं. भाजपा हमें समझा रही है कि हमारे सिंबल से चुनाव लड़ जाइए, लेकिन हमें अपना 16 वर्ष पुराना संगठन चलाना है न कि हमें सांसद बनना है. 

पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी उतारा अपना प्रत्याशी
राजभर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मैं पहला मंत्री हूं जिसने सत्ता छोड़ दी है. सत्ता का लालची होता तो संजय निषाद की तरह उनके सिंबल पर चुनाव लड़ जाता. राजभर ने यह भी कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2017 में भाजपा को 125 सीट दिलाने में उनका सबसे बड़ा योगदान है. राजभर की पार्टी ने पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी अपना प्रत्याशी उतार कर भाजपा के खिलाफ बिगुल फूंका है. सुभासपा ने वाराणसी में सिद्धार्थ राजभर को उतारा है, हालांकि शाम को पार्टी ने वाराणसी से उतारे गए प्रत्याशी को बदलते हुए सिद्धार्थ राजभर की जगह सुरेंद्र कुमार राजभर को टिकट दे दिया. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय के खिलाफ भी पार्टी ने बैजनाथ राजभर को मैदान में उतारा है. 

उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में राजभर समाज कई जिलों में फैला है. गाजीपुर में इसकी संख्या अच्छी है और माना जा रहा है कि ओम प्रकाश राजभर की नाराजगी का असर गाजीपुर से लोकसभा चुनाव लड़ रहे केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा को झेलना पड़ सकता है.  



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