वो एक अबूझ सा अस्तित्व


रात
आधी रात में पसरे 
ख़ामोश सन्नाटे
में अक्सर वो उठकर 
अपने बच्चों
को टटोल लेती है
सुकून हलक में भर फिर नजरें
सोते हुए पति पर डाल के
अपने बिखरे पल्लू को कांधे पर
समेट उबासी लेते हुए फिर 
थके कोहनियों को बिस्तर पर
टिका निढाल सी पड़ जाती है
जाने कब नींद की आगोश में डूबती सी
अगली सुबह फिर से
अपने अपनों को यूँ ही आराम देने
की खातिर
वो एक अबूझ सा अस्तित्व

- मनु खत्री       


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