28 साल की उम्र, बहुत दु:खदायी होता है असमय किसी पौधे का मुरझा जाना

प्रत्यूषा बनर्जी के बहाने   


''मैं कभी-कभी टीवी में देखता था, कोई कार्यक्रम आता था संगीत प्रतियोगिता का छोटे छोटे बच्चे, अद्भुत प्रतिभा। लेकिन जीतेगा तो कोई एक ही न। मैं रोते हुए बच्चों और रोते हुए मां बाप को देखता हूँ। अजीब हैं यार ये लोग। इस उम्र में हमारे यहां बच्चे दौड़ते हैं, गुल्ली डंडा खेलते हैं। और आपने गला काट कंपटीशन में डाल दिया अभी से? यह नहीं सोचा कि यह टूटा हुआ बच्चा फिर संभलेगा भी कि नहीं!'' 




बलिया से असित कुमार मिश्र

हुत दु:खदायी होता है असमय किसी पौधे का मुरझा जाना। मैं प्रत्यूषा बनर्जी को बहुत नहीं जानता। थोड़ी बहुत चर्चा जरुर सुनी थी। लेकिन अट्ठाईस साल की उम्र को बखूबी जानता हूँ और उस तनाव को भी जिससे गुजर गईं हैं वो। 

तीन चार साल पुरानी एक घटना याद आ गई। नया नया बी एड् किया था। लगता था कि दुनिया में एकलौता मास्टर मैं ही हूँ। इसी खुशी में इलाहाबाद निकल गया पढाने। वहां मेरे एक विद्यार्थी मित्र उदित थे ही।एक दिन उन्होंने बताया कि थोड़ी दूर पर मुकेश भैया हैं एकदम चलते फिरते गूगल। मने कुछ भी पूछिए और उत्तर लीजिए। सिविल की तैयारी करते हैं। मिलने चलेंगे? 

मैंने कहा कि - सिविल फील्ड तो नहीं मेरा, लेकिन खलिहर आदमी हूँ तो चलो मिल लिया जाए। 

मुकेश भैया चाय बना रहे थे। छननी हाथों में लिए छननी ढूंढने में व्यस्त... खैर बातें हुईं, खूब हुईं, हंसी ठहाके भी हुए।

मैंने पूछा कि भैया अगर नीली बत्ती नहीं मिली तो? 

मुकेश भैया जैसे रोने के मूड में आ गए। बोले कि असित मैंने कुछ दूसरा सोचा ही नहीं यार। मर जाऊंगा मैं तो... कैसे भी नीली बत्ती लेनी है... साली एक दिन के लिए ही सही। 

मैंने कहा कि भैया जब आप इतने समर्पित हैं तो जरुर मिलेगी। मुझे मत भूलिएगा लेकिन। 

ऐसे ही समर्पित और लगनशील हजारों लडके हैं। मैं भी शामिल हूँ उनमें।इंटर बायोलॉजी से किया। विशेष योग्यता भी रही भौतिकी में। पक्का इरादा था कि डाक्टर बनना है। चश्मा भी लग गया था पावर वाला। लेकिन अक्सर वो नहीं होता जो हम चाहते हैं... मेरा चश्मा भी टूटा ख्वाब भी और साथ ही मैं भी।मन करता था आत्महत्या कर लूँ। मन मारकर बी ए में एडमिशन लिया हिंदी भूगोल राजनीति के साथ। हिंदी यह सोचकर लिया कि चलो बोलना और लिखना तो आता है न! भूगोल और राजनीति तो एकदम समझ में नहीं आते थे । उसमें भी सरकारी कालेज की पढ़ाई। लेकिन मन लगाया फिर एक बार। समर्पित हुआ फिर एक बार। 

और बी ए में हिंदी में विशेष योग्यता रही पूर्वांचल विश्वविद्यालय से। जहाँ प्राध्यापक नंबर देना और किडनी देना एक बराबर समझते हैं। हिंदी से एमए भी कर लिया। तब पता चला कि यूपी में हिंदी के साथ संस्कृत भी चाहिए टीजीटी पीजीटी देने के लिए। फिर से बी ए किया संस्कृत से। पांच साल लगा। एक बार मुझसे परीक्षा छूट गई। एक बार रिजल्ट आने में दो साल लग गया। तब जाकर 2011 में फार्म भर पाया। भाग्य देखिए! मामला कोर्ट में चला गया अब तक परीक्षा ही नहीं हुई वह। अब शायद जून में होगी। लेकिन यहां भी तकदीर आगे है - अब बोर्ड ने नया नियम लगाया है कि इंटर में संस्कृत चाहिए। एक बार फिर अपात्र घोषित हो गया हूँ। 

सच कहता हूं मैंने जीवन में दूसरा कोई फार्म ही नहीं डाला अध्यापक के अलावा। मेरा पूरा समर्पण है, मैंने दूसरा कुछ सोचा ही नहीं इसके अलावा। 
अब अगर आप पूछ दें कि अच्छा असित भाई अगर टीचिंग की नौकरी न मिली तो? 

तो मेरा जवाब वो नहीं होगा जो मुकेश भैया का था। मैं मरुंगा नहीं। कोचिंग पढाने लगूंगा। कुछ और करुंगा बिलकुल उसी समर्पण के साथ जो कल बायोलॉजी में था या आज हिंदी में है। क्योंकि कहानी में चान्स मिलता है जिन्दगी में नहीं। मैं ही नहीं रहा तो कौन सा टीचर और कौन सा डाक्टर? जिंदा हूँ तो उम्मीद तो है न कि आज नहीं तो कल बनूंगा ही। 

दरअसल मुकेश भैया का सपना उनकी वास्तविकता पर भारी था। वो हर समय तनाव में थे। साक्षात्कार से पहले लूज मोशन, हल्का बुखार, झुंझलाहट, सामान रखकर भूलना यह सब आम बात थी। उन्होंने पहले नीली बत्ती की सोची बाद में जिंदगी। 

एक कहानी और है छोटी सी ही। मुजफ्फरनगर की एक लड़की थी। ठीक ठाक घर की। इलाहाबाद गई थी लेक्चरर हिंदी की तैयारी करने। एक प्रतियोगी ग्रुप में जुडी हुई थी मुझसे। पहुचते ही फोन किया उसने कि सर कौन सी किताब लूं? मैंने कहा कि उमेश तिवारी की ले ले भाई। मैं खुद ही पढता हूँ उस किताब को। 

तीन दिन बाद फिर उसका फोन आया कि सर किताब तो नहीं मिल रही। मैंने राहुल को बोल दिया है वो ला देगा कहीं से भी। 

मैंने पूछा कि ये राहुल कौन हैं? तुम तो अकेले आई थी? 
उसने कहा(झिझकते हुए)- जी ब्वॉयफ्रेंड है मेरा। 
मैंने कुछ नहीं कहा। क्या कहता मेरे बराबर की लड़की है, व्यक्तिगत बात है यह उसकी। हां, थोड़ी हैरानी हुई कि यार इलाहाबाद के प्रीति गर्ल्स हॉस्टल में रहकर अल्लापुर में बिकने वाली किताब तीन दिन में नहीं ढूंढ पाई और ब्वॉयफ्रेंड ढूंढ लिया? 

ब्वॉयफ्रेंड /गर्लफ्रेंड मेरे हिसाब से देखा देखी बनते बनाते हैं। उसकी है तो मेरी क्यों नहीं? 'कोई न कोई चाहिए' टाईप फिल्मी डायलॉग सर में घूमता रहता है। 

इसका एक और कारण है। इस उम्र में भावना (प्रेम और आकर्षक की) प्रबल होती है। घर परिवार से कटा हुआ लड़का लड़की का यह प्रेम फ्लो होना चाहता है। लेकिन हो कहां? न मम्मी को फुर्सत न पापा को। भाई-बहनों से ऐसे ही दूरी। साथ की लड़कियां सब जलने वाली और ब्वॉयफ्रेंड वाली। इसी बीच कोई लड़का मिल गया और वही उपादान बन जाता है उस प्रेम का। 

कुछ दिनों तक सब हरा भरा लगता है। अचानक से 'भाषा विज्ञान' के ऊपर 'लैक्मे' रख दिया जाता है और 'हिंदी साहित्य' के ऊपर 'गार्नियर का फेशवाश' । महादेवी के ऊपर गागल और कबीर के ऊपर स्टाल। फोन का आना, एसएमएस का आदान-प्रदान। और फिर वहां क्यों गई थी? वो लड़का कौन था? उस कोचिंग में क्यों गई? वो मस्टरवा क्या कह रहा था तुमसे? टाईप सवाल प्रतियोगी सवालों पर भारी पड़ने लगते हैं। और फिर घर वापसी। 

गर्लफ्रेंड /ब्वॉयफ्रेंड मैं नहीं बनाता तो ऐसा नहीं कि मैं विरोध में हूँ। लेकिन आपके लक्ष्य आपके सपने और आपकी जिंदगी पर आपका गर्लफ्रेंड /ब्वॉयफ्रेंड भारी पडने लगे इससे अच्छा है कि वह प्रेम कविता, कहानी, बागवानी, रेखाचित्र बनाने में लगाइए। कुछ नहीं यार! बहुत प्यार आए तो आधा किलो ऊन खरीदो स्वेटर बुनो। नफरत जागे तो फिर से उघार कर गोला बना कर रख लो। फिर प्यार आए तो फिर दूसरा डिजाइन बनाओ। 

एक समस्या और है इसके साथ-साथ। कम उम्र में अप्रत्याशित नाम पहचान या उपलब्धि का मिलना। मुकेश भैया ने एक बात कही थी - यार आधा इलाहाबाद मुझे एस डी एम कहता है। अगर नहीं बना न तो... 
यह दबाव मेरे साथ भी है - यार हजारों लोग जानते हैं मुझे कि टीचर हूं। प्रेमचंदर कहते हैं और अगर टीचर न बना तो... 
यह दबाव का मनोविज्ञान है। आसानी से पीछा नहीं छोडता। 

मैं कभी-कभी टीवी में देखता था, कोई कार्यक्रम आता था संगीत प्रतियोगिता का छोटे छोटे बच्चे, अद्भुत प्रतिभा। लेकिन जीतेगा तो कोई एक ही न। मैं रोते हुए बच्चों और रोते हुए मां बाप को देखता हूँ। अजीब हैं यार ये लोग। इस उम्र में हमारे यहां बच्चे दौड़ते हैं, गुल्ली डंडा खेलते हैं। और आपने गला काट कंपटीशन में डाल दिया अभी से? यह नहीं सोचा कि यह टूटा हुआ बच्चा फिर संभलेगा भी कि नहीं! 

बहुत बड़ा नहीं लिखना है। मुझे लगता है कि स्वर्गीया बनर्जी के साथ यही सब कारण रहे होंगे। बहुत बड़ी संख्या है जो इस उम्र में है और बहुत तरह के तनाव झेल रही है। यह तर्क की बात नहीं है। हम सबको इस पर गंभीरता से सोचना होगा। हमें यह सीखना, सिखाना होगा कि असित कुमार मिश्र को कोई झिझक नहीं है चाहे वो इलाहाबाद में लेक्चरर बने या ब्रेड पकौड़े बेचने वाला। मैं अपना सौ प्रतिशत उसी काम में दूंगा। पूरे इलाहाबाद में सबसे बेहतरीन स्वाद मेरे ब्रेड पकौड़े का होगा, यह वादा करता हूं आज ही। क्योंकि सपने में जिंदगी नहीं आती। जिंदगी में सपने आते हैं। 

आखिरी बात! मुकेश भैया को नीली बत्ती मिली। एक ही दिन के लिए....हां एम्बुलेंस से ही उनकी लाश गई थी घर.... 

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