क्या बीजेपी वरिष्‍ठ नेताओं को दरकिनार कर रही है? ताई के पत्र से उठीं चुनाव सुधार की चर्चाएँ


''असल में यह हमारी चुनाव प्रणाली का दोष है कि नेता कभी रिटायर्ड ही नहीं होते. 90 साल के हो जाएँ या 92 या 100 साल के चुनाव लड़ने के लिए, सत्ता की कुर्सी पर बैठने के योग्य बने रहते हैं. रिटायर्ड का मामला केवल शासकीय सेवा के लिए है. होना तो यह चाहिए कि एक नेता को दुसरी बार टिकिट न दिया जाए, अन्यथा कार्यकर्ता का क्या होगा? ऐसे में तो वह जीवन भर दरी बिछाता ही रह जाएगा. इस बार बीजेपी ने 75 पार का फार्मूला ही सही, अपनाया तो, लेकिन दबी जुबान कहीं न कहीं, कठोरता से फैसला नहीं ले सकी. यही बजह बनी कि 'ताई' को प्रेस को पत्र लिखना पड़ा.'' 

बीजेपी में वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा की जा रही है, जैसी ख़बरें अक्सर सुर्खियाँ बनती रही हैं. अब एक बार फिर सुमित्रा महाजन 'ताई' के सीधे प्रेस को लिखे पत्र के बाद बीजेपी पर सवाल उठ रहे हैं. क्या बीजेपी अपने ही वरिष्‍ठ नेताओं को दरकिनार कर रही है? लेकिन इसी के साथ इस बार ताई के पत्र के बाद कुछ और बातें भी उठ रही हैं. बातें हैं चुनाव व्यवस्था में सुधार की. 

इंदौर से 8 बार सांसद रहीं सुमित्रा महाजन के सीधे प्रेस को लिखे पत्र के बाद बीजेपी पर सवाल उठ रहे हैं. सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि हाल में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा(जो अब पार्टी में नहीं हैं, उपेक्षा के चलते पार्टी छोड़ दिए हैं), सुषमा स्वराज, उमा भारती का टिकिट काट दिया गया है. इन्हीं के साथ और भी कई वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा की जा रही है, जैसी ख़बरें अक्सर सुर्खियाँ बनती रही हैं. सवाल हैं कि क्या बीजेपी अपने ही वरिष्‍ठ नेताओं को दरकिनार कर रही है? 


सुमित्रा महाजन बीजेपी में एक बड़ा नाम रहा है. वे इंदौर से 8 बार सांसद रहीं. उन्होंने पत्र के माध्यम से चुनाव लड़ने से मना किया है, लेकिन जो तरीका अपनाया उससे बीजेपी पर सवाल खड़े हुए हैं. 1989 से सुमित्रा महाजन लोकसभा पहुंच रही हैं. वे 16वीं लोकसभा की अध्यक्ष बनाईं गईं. उनके द्वारा जारी पत्र न तो प्रधानमंत्री को संबोधित था और न ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को, यह पत्र सीधा प्रेस को जारी किया गया, जिसमें पार्टी अध्यक्ष की जगह सादर प्रकाशनार्थ लिखा है, यानि छपने के लिए. सवाल है 8 बार तक सांसद रहीं सुमित्रा महाजन को आखिर प्रेस को पत्र क्यों जारी करना पड़ा? 

मध्य प्रदेश की इंदौर लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने अभी तक किसी उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है. इससे मौजूदा सांसद और लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन खासी नाराज हैं. अभी तक प्रत्याशी का ऐलान क्यों नहीं किया गया, को लेकर उनका मानना रहा कि पार्टी को किसी तरह का संकोच हो रहा है. 'ताई' को टिकिट नहीं देंगे तो 'ताई' क्या सोचेगी? सुमित्रा महाजन ने सवाल किया कि यह अनिर्णय की स्थिति क्यों है? इसलिए मैं पार्टी को चिंता मुक्त करने के लिए ऐलान करती हूँ कि मैं इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लडूंगी. 

लोकसभा स्पीकर ने कहा मैंने पहले ही ये फैसला उन पर छोड़ दिया था. इसके बाद भी यह स्थिति बन रही है सो पत्र के माध्यम से उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगी, ताकि पार्टी बिना किसी संकोच के साथ निर्णय ले सके, लेकिन इससे पार्टी पर वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लग रहा है. 

विपक्ष राहुल गांधी ने कहा है बीजेपी हिन्दू धर्म की बात करती है. हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा गुरू होता है, और बीजेपी अपने गुरू आडवाणी का ही अपमान कर रही है. 

असल में यह हमारी चुनाव प्रणाली का दोष है कि नेता कभी रिटायर्ड ही नहीं होते. 90 साल के हो जाएँ या 92 या 100 साल के चुनाव लड़ने के लिए, सत्ता की कुर्सी पर बैठने के योग्य बने रहते हैं. रिटायर्ड का मामला केवल शासकीय सेवा के लिए है. आम जनता की चर्चाओं को सुनें तो होना तो यह चाहिए कि एक नेता को दुसरी बार टिकिट न दिया जाए, अन्यथा कार्यकर्ता का क्या होगा? ऐसे में तो वह जीवन भर दरी बिछाता ही रह जाएगा. इस बार बीजेपी ने 75 पार का फार्मूला ही सही, अपनाया तो, लेकिन दबी जुबान कहीं न कहीं, कठोरता से फैसला नहीं ले सकी. यही बजह बनी कि 'ताई' को प्रेस को पत्र लिखना पड़ा. सुमित्रा महाजन 'ताई' के पत्र से भी यह बात साबित होती है, उन्हें इस बात का मलाल कतई नहीं है कि उनका टिकिट काटा जा रहा है, मलाल इस बात का है कि साफ़ साफ़ बोलो तो.. असमंजस की स्थिति क्यों बनी? 

चुनाव सुधार की बात की जाए तो बहुत कमियाँ हैं. वर्तमान प्रणाली में, लेकिन इस बार बीजेपी से ही एक यह उम्र का बंधन और दुसरी चुनाव में मितव्ययता रोकने के लिए एक कदम कोई एक केंडीडेट यदि वर्तमान में सांसद या विधायक है तो उसे इस कार्यकाल के दौरान अन्य सांसद या विधायक का चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. यदि ऐसा नहीं होता है तो बाद में उसके जीतने पर पुराने स्थान से उसे रिजाइन करना होगा, सीट खाली करनी होगी. ऐसे में तब वहां फिर से चुनाव कराये जायेंगे. 



हाल में कुछ इसी प्रकार से बात करते हुए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि चूंकि वह हाल में विधायक निर्वाचित हुए है, सो वह कहीं से भी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहेंगे. शिवराज सिंह चौहान को भोपाल से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ मैदान में उतारने की चर्चाओं पर उन्होंने यह कहा है. अब यह अलग बात है कि उनकी मंशा अपनी पत्नि साधना सिंह चौहान को  फ्रंट में लाने की हो, जो कि राजनीति के क्षेत्र में शिवराज सिंह चौहान के साथ कदम कदम पर साथ दिखी हैं. अलबत्ता शिवराज सिंह चौहान की यह बात सराहनीय है. 

इस बात को देखें तो किस एक केंडीडेट के 2 स्थानों से चुनाव लड़ने का नियम भी कुछ इसी प्रकार का है. यदि कोई केंडीडेट 2 जगह से चुनाव लड़ता है और दोनों जगह से विजयी रहता है तब उसे एक सीट छोड़नी होगी, तब छोड़ी गई सीट पर एक बार फिर मतदान कराना होगा, जिसमें अनावश्यक अपव्यय होगा. वर्तमान लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के राहुल गांधी 2 स्थान उत्तरप्रदेश की अमेठी के साथ केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे हैं, तो वहीं पीएम नरेन्द्र मोदी के उत्तरप्रदेश के वाराणसी के अलावा गुजरात के अहमदाबाद पूर्व से भी चुनाव लड़ने की चर्चाएँ हैं. इसके पूर्व भी वर्ष 2014 में पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश के वाराणसी और गुजरात के वड़ोदरा से लड़ा था. दोनों जगहों से उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की थी और बाद में बड़ोदरा की सीट उन्होंने छोड़ दी थी. 

-चित्रांश      

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