शिव का सलोना-मोहना वह आत्मिक रूप, जो शिव को भोलेनाथ बनाता है


महाशिवरात्रि पर विशेष शिव उनकी सती और पार्वती


''भोले एक बार पार्वती को मनाते हुए कहते हैं कि वे किसी समृद्ध राजकुमार से विवाह करें. उनके साथ योग में योगी और भोग में भोगी हैं. पार्वती अपनी जिद्द पर अड़ी रहती हैं. भूत-भभूत की बारात उनके गणों के साथ अनूठे तरीके से पार्वती को वरने निकलती है. माँ मैनावती अपनी राजकुमारी को भभूतधारी शिव के हाथों सौंपने से मना करती है, फिर जब शिव का सलोना-मोहना रूप देखती हैं. तो गठबंधन को तैयार होती हैं. यह सलोना-मोहना रूप बाहरी शरीर से अलग भीतरी है. आत्मिक, जो शिव को भोलेनाथ बनाता है.''



श्रुति अग्रवाल    

शिव मेरे अराध्य ही नहीं प्रथम गुरु है. प्रथम ही नहीं, अंतिम गुरु भी. शिव मेरे लिए सष्टिकर्ता भी हैं और संहारक भी. त्रिनेत्रधारी, तीसरा नेत्र खोले तो जग विध्वंस कर दें. वे कत्थक के जन्मदाता हैं. रागनियों के प्रणेता हैं. जग में रमता जोगी हैं. भोग में वे भोगी हैं. और योग में महायोगी. जब-जब महाशिवरात्रि आती है मैं शिव-पार्वती की जगह शिव-सती की धुन को गुनती जाती हूं. दिमाग को धुनती जाती हूं..एक धुन सी लगी है. कितना अजब रिश्ता था शिव-सती में. मेरे पिता ने एक बार कहा था शिव-सती के विवाह को संसार का प्रथम प्रेम विवाह. एक विलक्षण संयोग. दक्षराज की पुत्री राजकुमारी सती और मेरे औघड़ शिव का. राजकुमारी हर सांसारिक मोह को त्याग अपने भोले को वरण करने चली. लेकिन मायके की याद से दूर नहीं हो पाई. पिता के प्रेम में विचलित रही.

एक बार मेरे अराध्य की जीवनगाथा को आज के युग से जोड़ कर देखिए. बेहद सुंदर, नाजो से पली राजकुमारी. नृत्य करते- डम-डम-डमरू बजाते, गले में सांपों की माला डाले शिव की ओर आकर्षित होती है. कत्थक की बारिकियां सीखते-सीखते शिव की रागनियों में डूब जाती हैं और उन्हें वर लेती हैं. माँ औघड़ जामाता को देख डरती हैं. दक्ष प्रजापति विरोध करते हैं. बेटी हठ पर अड़ जाती है. त्रिदेवों में से एक शिव को, राजा मना नहीं कर पाता. कभी मन से जमाता भी नहीं मानता. आप सोचिए. सती ने अपने पिता के सामने अपनी इच्छाओं का दमन नहीं किया लेकिन पिता के प्रति अपनी प्रीत भी कम नहीं कर पाईं वे. पिता यज्ञ कर रहे हैं, यह सुनकर पुत्री पिता के द्वार जाती है, पति के लिए कटु-कठोर वचन सुन पत्नी आत्मदाह करती है.

सती से यह बिछोह मेरे अराध्य को असहनीय पीड़ा देता है. वे मृत सती की देह कांधे में टांग जोगियों की तरह भटकते हैं. सती के अंग गलकर गिरते जाते हैं. शक्तिपीठ बनते जाते हैं. लेकिन-लेकिन मेरे अराध्य का मन शांत नहीं होता. फिर योगी शिव अनंत ध्यान में खो जाते हैं. इच्छाओं का दमन जब मेरे अराध्य को शिव को, महायोगी को इतनी पीढ़ा पहुंचा सकता है. तो हम क्या सीख रहे हैं. क्यों एक-दूसरे की इच्छाओं का दमन कर दु;खवादी बन रहे हैं. क्यों हम शिव के शिवतत्व को समझ नहीं पा रहे हैं. शक्तिपीठ बनाने के पीछे भी मेरे अराध्य का उद्देश्य उनकी ब्याहता को सम्मान देना है. सती की योनी तक को सम्मान दिया गया. कामाख्या शक्तिपीठ की स्थापना हुई. क्योंकि शिव-सति, शिव-पार्वती मिलकर ही संसार की रचना करते हैं शिवलिंग और माँ कामाख्या के गूढ़ रहस्य को हम जानते हुए भी अंजान बनते हैं.

सती से बिछोह के बाद भोलेनाथ अनंत ध्यान से तब ही बाहर आते हैं जब सती, पार्वती के रूप में उनके सामने आती है. मुस्कुराती है. .यहां भी अजब संयोग देंखे. पार्वती भी राजकुमारी हैं. वे शिव को पाने के लिए कठोर साधना करती हैं. भोले एक बार पार्वती को मनाते हुए कहते हैं कि वे किसी समृद्ध राजकुमार से विवाह करें. उनके साथ योग में योगी और भोग में भोगी हैं. पार्वती अपनी जिद्द पर अड़ी रहती हैं. भूत-भभूत की बारात उनके गणों के साथ अनूठे तरीके से पार्वती को वरने निकलती है. माँ मैनावती अपनी राजकुमारी को भभूतधारी शिव के हाथों सौंपने से मना करती है, फिर जब शिव का सलोना-मोहना रूप देखती हैं. तो गठबंधन को तैयार होती हैं. यह सलोना-मोहना रूप बाहरी शरीर से अलग भीतरी है, आत्मिक. जो शिव को भोलेनाथ बनाता है. जिस पर रीझे बिना कोई स्त्री रह नहीं सकती. हमारे अराध्य का अपना परिवार है. वे युद्ध करते हैं, सृजन करते हैं, विध्वंस करते हैं, भक्तों की भक्ति में रमते हैं. जोगी हैं, योगी हैं, भोगी हैं. फिर क्यों हम उनकी सच्ची भक्ति से डरते हैं. शिव झूमकर नृत्य करते हैं, खुलकर जीने की कला सिखाते हैं. राग-रागनियां गाते हैं, वे हमें मुस्कुराना सिखाते हैं. वे इच्छाओं को पूर्ण करना सिखाते हैं. फिर हम उनकी भक्ति करते हुए अपने-अपनों की इच्छाओं का दमन कैसे कर सकते हैं. सोचिए..समझिए. शिव कुछ कह रहे हैं. कला के जन्मदाता हमें जीवन जीने की कला सिखा रहे हैं.
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