सरकार हर काम का कुछ निश्चित धन क्यों न अनिवार्य कर देती, एक संशोधन करके

एक काम सौ दाम ( एक व्यंग )


''सरकारी विभाग से कोई काम लेना हो और आप ईमानदारी का बिल्ला लगाकर जायें तो ये जरूर जान लीजिये आपको आश्वासन के सिवा कुछ हाथ न आने वाला! लाख चिल्लाते रहें, मंत्री-मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार बंद किया जाय! भ्रष्टाचारी को कड़ी से कड़ी सजा दी जाय! और जब चुनाओं का समय आता है, इन्ही नेताओं द्वारा चंदा के लिए धन उगाही की मुहिम चलायी जाती है! ''



सीमा "मधुरिमा" लखनऊ    

तो भैया ऐसा ही एक किस्सा है तिवारी जी के पेंशन पुनरीक्षण से संबंधित! बेचारे तिवारी जी अस्सी साल के जर्जर बूढ़े बिस्तर से हिलना दूभर, कैसे जाए दफ्तर. उन्होंने एक एप्लीकेशन डाक द्वारा अपने ऑफिस भिजवा दिया! सरकारी ऑफिसों में ऐसे एप्लीकेशन तमाम आते रहते हैं और संबंधित बाबू को मार्क हो किसी कचरे की तरह रख दिए जाते हैं! कहने की आवश्यकता नहीं की तिवारी जी का प्रार्थना पत्र भी एक तरफ रख दिया गया! इधर तिवारी जी बड़े प्रसन्न सोचे अगर कार्यालय तक जाते तो अच्छे खासे पैसे खर्च हो जाते चलो घर बैठे काम बन गया! तिवारी जी अपनी कामयाबी पर बड़े ही प्रसन्न थे और अगल बगल के बाकी बुजुर्गों को भी समझाने लगे कि दफ्तर तक मत जाया करो घर बैठे भी काम हो सकता हैं! देखो बढ़िया सरकार आयी है. पूरी तरह से बेईमानों के खिलाफ मोर्चा खोले हैं! दफ्तर तक जाओगे तो अनावश्यक चाय पानी के बहाने दफ्तर वाले अच्छा खासा वसूल लेते हैं और हाँ जो लोग थोड़े अच्छे स्मार्ट दीखते हैं, उनसे और ज्यादा माँग की जाती है उनके रुतबे के हिसाब से! मजबूरी में कभी दफ्तर जाना भी पड़े तो कोशिश करके थोड़े फ़टे पुराने मैले कुचैले कपड़े पहन कर जाना और घर खर्च का रोना जरूर रोना.. बोलना बच्चे सब पैसे छीन लेते हैं और हाथ में कुछ न रह जाता! ये सब हथियार हैं उनके रहम के अन्यथा, आपकी जेब में किस स्तर तक सेंध लग सकती है, भगवान भी नहीं जानता! 

तिवारी जी के प्रार्थना पत्र भेजे छः महीने बीत चुके थे, पर उनको किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली! फिर तिवारी जी ने अपने बेटे से मिन्नतें की, कि उनके दफ्तर जाकर पता लगाए कि क्या बात है! उनका बेटा पहुंचा सरकारी दफ्तर! तीन घंटे इन्तजार के बाद तो बाबू जी नजर आये सूटेड बूटेड जो चमचमाती झक्क सफ़ेद गाड़ी से आये थे! तिवारी जी के बेटे को ऊपर से नीचे तक घूरा और बोले, "बताओ जनाब, ऐसे कहीं काम होता है, आ गयी एक एप्लीकेशन, अब हम लोग कोई सुदर्शन चक्र लिए तो बैठे नहीं... जो बीस साल पहले सेवानिवृत्त कर्मचारी के प्रार्थना पत्र की पुष्टि करे कि असली हैं कि कोई कार्यलय से मसखरी तो नहीं कर रहा. देखिये जब तक तिवारी जी खुद नहीं आते, इस पर कार्यवाही नहीं हो सकती."

तिवारी जी का बेटा, "देखिये बाबूजी मेरे पिता अत्यंत वृद्ध हैं और उनका चलना फिरना दूभर हैं. अब ऐसे में उन्हें यहाँ तक कैसे लाया जाय, आप कुछ ले दे के काम आगे बढाईये."

बाबू, "आप भी अजीब हैं, हमने तो आपसे कुछ माँगा नहीं. और आप देने का दबाब बना रहे, कल के दिन सबसे कहते फिरेंगे बाबू काम के पैसे लेता है."

तिवारी जी का बेटा, "अरे नहीं नहीं आप भी कैसी बातें करते हैं, हम किसी से कुछ नहीं कहेँगे. अब देखिये आज ही अपने ऑफिस का काम छोड़कर हम आये हैं ऐसे में बार बार आपके पास आने में भी तो मेरे काम में दखल पड़ेगा. आने जाने का खर्च अलग और हाँ बाबूजी जितने टेबल पर ये फ़ाइल जाए उनके भी खर्च जोड़कर बता दीजिये. बस काम आराम से हो जाए हम खर्च करने में पीछे नहीं हटेंगे!"

बाबूजी, "ठीक है, ठीक है, बाहर जाकर हमारे चपरासी से बात कर लो वही जाता है हर जगह डाक लगाने! फिर क्या तिवारी जी के बेटे ने अपना काम बनाया और अगले ही माह उनकी पेंशन बढ़ी हुयी उनके खाते में पहुँच गयी! तिवारी जी आज भी फुले नहीं समाते कि उनके मात्र एक प्रार्थना पत्र से उनका काम हो गया, तिवारी जी के बेटे ने लेन देन की बात खुद तक जो रखी थी.

समझ नहीं आता गर सरकारी काम काज बिना बजन के नहीं होते तो आखिर सरकार हर काम का कुछ निश्चित धन क्यों न अनिवार्य कर देती है, एक संशोधन करके, क्योंकि किसी भी काम के लिए कितना धन ऊपरी खर्च में लग सकता है इसका कोई मानक नहीं, कई बार ये धन मिलने वाले लाभ से भी अधिक हो जाता है. और कई बार इस उहापोह और बार्गेनिंग के जमाने में कई तथाकथित करोड़ीमल लोगों के काम होते ही नहीं और कई ईमानदार कर्मचारी जो कमर कसे रहते हैं की एक पैसे खर्च नहीं करेंगे, उनको तो एक सप्ताह के काम कई बार दस दस वर्ष लग जाए तो भी कम हैं.

क्या करें कहाँ जाए, जाने किस मिट्टी के बने होते हैं ये व्यवस्था वाले. देखते देखते, ऊँची ऊँची इमारतों के मालिक हो जाते हैं और फिर इसी प्रकार की किसी नौकरी के लिए अपने बच्चों को फिट बिठाने में भी लाखों खर्च कर देते हैं!

Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc