आनंद और इसका इंडेक्स, नहीं दे सका आनंद



प्रदेश में बड़े जोरशोर से आनंद विभाग शुरू किया गया था। नागरिकों की खुशहाली मापने के लिए हैप्पीनेस इंडेक्स की कवायद भी धूमधाम से शुरू की गई थी। पुरानी सरकार के कार्यकाल में ही इस विभाग की कोई खास उपलब्धि नहीं रही और जैसे ही सरकार बदली पूरा विभाग ही ठंडा हो गया।



संजय सक्सेना

शिव सरकार में बने राज्य आनंद संस्थान के निदेशकों को मूल विभाग में लौटा दिया गया है, स्टाफ के नाम पर अब दो अधिकारी ही बचे हैं। विभाग का नाम पहले ही बदल चुका है। हैप्पीनेस इंडेक्स के लिए सरकार ने लाखों रुपए खर्च कर आईआईटी खडग़पुर से एमओयू किया था। कर्मचारियों को ईशा फाउंडेशन और आर्ट ऑफ लिविंग भेजकर प्रशिक्षण भी दिलाया था। सही बात तो यह है कि इस विभाग की उपयोगिता अब तक साबित नहीं हो पाई। इस पर करीब दो साल तक लाखों रुपए खर्च कर प्रदेश में अनेक स्तर पर गतिविधियां संचालित की गईं, प्रशिक्षण के लिए अधिकारी और कर्मचारियों को कोयंबटूर, बंगलुरु और पुणे भेजा गया। आईआईटी खडग़पुर को खुशहाली मापने के लिए करीब 30 लाख रुपए का भुगतान किया गया, लेकिन यह पूरी कार्रवाई अब तक सिरे नहीं चढ़ पाई। इसका सर्वे भी कागजों में ही सिमट कर रह गया। बताया जाता है कि हैप्पीनेस इंडेक्स निर्धारित करने वाली प्रश्नावली को ही अंतिम स्वरूप नहीं दिया जा सका। 

आईआईटी खडग़पुर से प्रश्नों का हिंदी अनुवाद कराने को कहा गया था, साथ ही यह भी पूछा गया कि खुशहाली का पैमाना निकालने के पहले सेंपल सर्वे का दायरा कितना बड़ा होगा? हैप्पीनेस इंडेक्स के नतीजों को आधार बनाकर पूर्व सरकार ने प्रदेश की नीतियां निर्धारित करने का भी दावा किया था। यह भी बताया गया था कि देश में इस दिशा में पहल करने वाला मप्र पहला राज्य होगा। दुनिया में अब तक केवल भूटान, दुबई और यूनाइटेड नेशन ने इस क्षेत्र में काम शुरू किया है। देखा जाए तो आनंद विभाग के नाम पर कुछ लोगों ने अपनी दुकान ही चलाई है। सरकारी पैसे से ऐसे कार्यक्रम कराए गए, जिनका कोई नतीजा निकलना ही नहीं था। ऐसा लगा कि कुछ संस्थाओं को उपकृत करने के लिए ही इस विभाग का गठन किया गया था। ईशा फाउंडेशन की तरफ से तो केवल एक बार ही लोग आए, उसके बाद उनका कोई बड़ा आयोजन तक नहीं हुआ। आनंद के इंडेक्स का सर्वे भी नहीं हुआ। 

प्रदेश के नागरिक कितने खुश हैं, इसका प्रमाण तो आंकड़े दे रहे हैं। किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन थमा नहीं है। छात्रों और बेरोजगारों की आत्महत्या के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। उधर ये दावा जरूर किया जा रहा है कि प्रति व्यक्ति औसत आय बढ़ी है, लेकिन एक तो राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। दूसरे, अमीरों और गरीबों के बीच खाई भी बढ़ती जा रही है, पांच प्रतिशत लोगों के पास बाकी 95 प्रतिशत से अधिक सम्पत्ति है। इतनी बड़ी असमानता के रहते आनंद या खुशी की बात करना भी बेमानी है। 
हालांकि फिलहाल विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। डेढ़ दशक बाद सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई है। नई सरकार आते ही आनंद विभाग का विलय नवगठित अध्यात्म विभाग में कर दिया गया। इस नए विभाग का खाका क्या रहेगा, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता, अब जल्दी ही लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने वाली है, चुनावी नतीजे आने के बाद ही इस योजना का भविष्य नए सिरे से निर्धारित होगा। अध्यात्म विभाग के पहले धार्मिक और धर्मस्व विभाग भी रहा है। लेकिन आनंद या खुशी का मामला कितना बन पाता है, जिन पैसों का भुगतान किया जा चुका है, उसका क्या होगा? जिन संस्थाओं को उपकृत करने के लिए ही सही, कांट्रेक्ट किया गया था, उनकी कितनी भूमिका रहेगी, यह तय करना होगा। विभाग रहे या न रहे, लेकिन सरकार को यह तो तय करना ही होगा कि प्रदेश के नागरिकों की समस्याएं कम हों। लोगों में आय का बंटवारा भी समान नहीं हो, तो इतनी असमानता भी न रहे कि जमीन और आसमान। खुशी अनुभव करने की चीज है, इसका इंडेक्स काल्पनिक ही हो सकता है। हां, खुशी काल्पनिक नहीं होती। यदि समस्याएं कम होंगी, लोगों को काम मिलेगा, परिवार का पालन-पोषण ठीक से कर पाएंगे तो प्रसन्नता का अनुभव होगा। बस..। यह सरकार को देखना होगा।

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