'मुझे नरेंद्र मोदी नापसंद है', उनके लिए, जो पूछते हैं कि नरेंद्र मोदी का विकल्प क्या है


''आप पूछिये कि नरेंद्र मोदी का विकल्प क्या है। तो मैं कहूंगा कि नरेंद्र मोदी मुझे नापसंद है। वह मेरे लिए आज विकल्प सूची में शामिल नहीं हैं इसलिए मैं इस बहस में नहीं पड़ता कि नरेंद्र मोदी के अतिरिक्त मुल्क के पास कोई विकल्प नहीं।''



Virender Bhatia
की कलम से     

वैसे भी इंदिरा is इंडिया की घोषणा के बाद भी भारत को नेतृत्व मिला। गैर कांग्रेसी सरकारों में भी सेंसिबल प्रधानमंत्री इस मुल्क को मिले, मुझे चंद्रशेखर अपने लघुतम कार्यकाल में सबसे बेस्ट लगे, जबकि उनकी पार्टी के पास पूरे 100 सांसद भी नहीं थे औऱ नरेंद्र मोदी सबसे खराब प्रधानमंत्री लगे, जबकि इनके पास पूर्ण बहुमत की सरकार थी।

राम मन्दिर के आंदोलन के बाद जिस तरह से bjp ने देश में साम्प्रदायिक कार्ड खेलना शुरू किया उससे मुल्क की विश्व भर में प्रतिष्ठा खराब हुई है।

उसके बाद आई नरसिम्हा राव की सरकार ने अर्थव्यवस्था के बुरे दौर को बदलने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए। नरसिम्हा राव के आने से पहले कोई नहीं जानता था कि नरसिम्हा राव कौन हैं। उन्होंने अल्पमत की सरकार चलाई और अर्थव्यवस्था को लेकर साहसिक निर्णय लिए।

इसलिए मौजूदा विकल्प से बेहतर विकल्प हमेशा मुल्क के गर्भ में छिपे रहते हैं। जनतंत्र की यह सबसे बुरी बात है कि यहां चुनाव जीतने और जिताने की जोड़तोड़ वाले को विकल्प समझ लिया जाता है। योग्यता का यह कोई मापदंड नहीं हो सकता।

अगर होता तो मोदी मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो हारे नेताओं को न दिये जाते। मनमोहन सिंह चुनावी नेता नहींं हैं इसलिए वे हर चीज़ को वोट में बदलने की नीयत से नहींं सोचते। यह मुल्क के लिए अच्छी चीज है।

नरेंद्र मोदी क्योंकि हर चीज को वोट के आईने से देखते हैं इसलिए वे कई बड़े झूठ जिन्होंने मुल्क की किरकिरी करवाई वे बोले औऱ कई बडे़ सच जिनकी वजह से मुल्क की तौहीन हुई, दबाए।

नरेंद्र मोदी 2014 की रैलियों में विकास की बात करते रहे। देश ने उन्हें मनमोहन सिंह की जगह चुना। 5 साल उन्होंने आरएसएस का छिपा हुआ एजेंडा चलाया क्योंकि वे आरएसएस की कठपुतली प्रधानमंत्री थे। नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी की कठपुतली कहते रहे लेकिन एक बार भी आईना नहीं देखा कि उन्हें आरएसएस औऱ पूँजी पतियों के इशारे पर चलना पड़ा पूरे कार्यकाल।

पांच साल बाद हम कह रहे हैं कि आप हमे नरेंद्र मोदी का विकल्प बतायें। नरेंद्र मोदी अगर इस देश का भाग्य हैं और देश विकल्पहीन है तो यह देश का दुर्भाग्य है। लेकिन देश विकल्पहीन नहींं है।ऐसा प्रचार किया गया है कि मोदी ही विकल्प है। 2014 से पहले तो खुद भारतीय जनता पार्टी इस असमंजस में थी कि प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन हो। अगर नरेंद्र मोदी खुद bjp को इतने सक्षम लगते तो उन्हें 2002 में ही राष्ट्रीय राजनीति में ले आते। लेकिन तब ही अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सुलझे हुए नेता ने खुद उन्हें अक्षम करार दिया।

2014 से हम विकास की उम्मीद में सरकार की ओर मुंह बाए खड़े हैं। औऱ सरकार बताती है कि उसने इतने करोड़ बल्ब बांटे इतने शौचालय बनवाये। सरकार छिपा जाती है कि नोटबन्दी के एक झटके ने चलती दौड़ती अर्थव्यवस्था के ब्रेक लगा दिये। करोड़ों रोजगार पैदा करने वाली इकॉनमी में लोग तेजी से बेरोजगार होने लगे हैं। नोटबन्दी क्यों की और इतना बड़ा फैसला था तो नरेंद्र मोदी कभी इसका जिक्र क्यों नहींं करते। नरेंद्र मोदी ने अगर विकास किया तो विकास पर वोट क्यों नहीं मांग रहे। क्यों सैनिकों की आड़ ली जा रही है। पांच साल में हम हर जगह पिछड़े हैं।

व्यापार की सहूलियत वाला देश बनाने की अपनी पीठ थपथपा कर नंबर बनाने वाले pm से पूछिए तो कि देश का माहौल बिजनेस लायक रहने दिया है क्या। रहने लायक भी रहने दिया किया। नोएडा के एक डेटा सेंटर ने गूगल से सम्पर्क किया कि आप इसे लीज पर ले लीजिए। गूगल ने कहा इसे सिंगापुर शिफ्ट कर दें। हम ले लेंगे। नोएडा रिस्की एरिया है।

क्या आपको शर्म नहीं आती जब विश्व समुदाय आपको linching और terror का जनक कहने लगे।

हमने नरेंद्र मोदी को इन चीजों के लिये नहींं चुना था। 2014 कि रैलियों में उन्होंने विकास पुरूष की छवि का जाल फेंका था। आज हम विकास ही पूछ रहे हैं कि क्या आपके पांच साल में देश आगे बढ़ा। किसी भी दिन किसी भी जगह आप बहस के लिए बैठिए। आपको आंकड़ों समेत बताया जाएगा कि देश पांच सालों में पिछड़ा है।

हम पूर्ण बहुमत की सरकार पाकर पिछड़े हैं तो हमे अल्पमत की सरकार ही भली । यह सेंसिबल देश है इसे सेंसिबल प्रधान की दरकार है। माफ करें नरेंद्र मोदी सेंसिबल कत्तई नहीं हैं।


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