की बन जोगण तेरे रँग में फिर..


सुनो न की छाँव बन खिल जाओ मेरे
आँगन के अमलताश से पीले फूलों की तरह..
- सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ 

यादों के अंतिम छोर से
मेरे वज़ूद के प्रथम सिरे तक
अक्सर तुम आतिथ्य ले
मेरे ख़यालों में बसते हो।

नदारद रह कर भी महसूस होते
हो तुम मेरे इर्द गिर्द उस दुपहर की
धूप से मेरे चेहरे के हर हिस्से पर..!

सुनो न की छाँव बन खिल जाओ मेरे
आँगन के अमलताश से पीले फूलों की तरह
या रँग जाओ उन पलाश के फूलों के रँग
बन अबकी होली में..!
की सरोबार हो जाऊँ तुम्हारे उस सुर्ख
पलाशी रँग में..!
अबकी होली न अबीर की चाहत
और न ही भाँग की खुमारी
बस चाहूँ तुम्हारी बातों का नशा
रँगत चढ़े मुझमें तुम्हारी शरारतों की
की हो जाऊँ थोड़ी गुलाबी मैं..!

अबकी बरस जाओ मनपसन्द के
रँग बन मुझ पर मलङ्ग फ़क़ीर
की बन जोगण तेरे रँग में फिर 
तेरी फ़क़ीरी में खुद को रँग लूँ मैं....!

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