समस्याओं से त्रस्त होकर हम सरकार बदल देते हैं, लेकिन हकीकत में कुछ बदलता ही नहीं


देश को धड़ों में बाँट कर बहरूपिये पा बैठे हैं सत्ता
 मलाईदार पदों की तरफ भागते आईएएस

जब साहेब ने कहा 'ना खाउंगा, न खाने दूंगा' लोग झूम उठे, लेकिन क्या ऐसा हुआ? क्या भ्रष्टाचार कम हुआ? नहीं न. क्यों नहीं हुआ, कहा जा सकता है सोच यह था ही नहीं. सोच था सत्ता पाना? वह मिल गई, अब राफेल को लेकर उंगलियाँ उठ भी रहीं हैं तो क्या...?  

''बात केवल एक उस महिला मंत्री की नहीं है, जो ठीक से शपथ तक नहीं ले पाती, या सीएम का संदेश तक ठीक से नहीं पढ़ पातीं. शेष कथित पढ़े-लिखे भी कहाँ कुछ समझ पा रहे हैं? यदि यह बात गलत है तो कोई बताये, देश के कर्णधार युवाओं के साथ यह कैसा मजाक किया जा रहा है? असल में देश को हर प्रकार से धड़ों में बाँट दिया गया है, अमीर-गरीब, हिन्दू-मुस्लिम. इसी दम पर बहरूपिये सत्ता पा बैठे हैं. और खुद को देश से ऊपर समझने वाले ये लोग सरकार चला रहे हैं.''   

'जिसको डांस नहीं करना/ वो जाके अपनी भैंस चराए', यह 'खूबसूरत' फिल्म का गाना है, जिसे किसी बादशाह नाम के शख्स ने लिखा है. हमारे बचपन में बड़े समझाते थे कि 'कुछ पढ़ लिख लो या भैंस ही चराओगे'. ये बीते दिनों की बात है. आज ये बातें ताजा कर दी हैं मध्यप्रदेश सरकार के हाल के एक निर्णय ने, जिसमें प्रदेश के बेरोजगारों को ढोर चराने का प्रशिक्षण देने की बात कही गई है. इसके पहले युवाओं की ही दम पर देश के प्रधानमंत्री बने साहेब भी जोरों से कह चुके हैं 'बेरोजगार हो तो पकौड़े तलो'. इस प्रकार के आदेश के पीछे क्या है जानने के लिए हम बैठे तो यह बातें भी याद हो आईं. असल में वो ज़माना और था, तब काम भी क्या थे, समयानुसार बढ़े-बूढ़े अपनी सलाह देते थे.

चप्पलें घिस रहा देश का युवा   
किसी भी देश की असली पूंजी और भविष्य उस देश के बच्चे और युवा होते हैं, लेकिन आज हमारे देश में सबसे खराब स्थिति में यही हैं. 90 साल के बूढ़े, जिनका एक पैर हमेशा कब्र में रहता है, सरकार चला रहे हैं, वहीं देश का युवा, जो कड़े निर्णय लेकर देश को सशक्त बना सकता है. वह डिग्री के रूप में हाथ में कागज़ लिए छोटी सी ही सही, नौकरी के लिए इस दफ्तर से उस दफ्तर चप्पलें घिस रहा है. 

देश के लिए भयावह स्थिति  
निश्चित रूप से यह देश के लिए भयावह स्थिति है. लेकिन क्या करें जिनके हाथों में देश है वह यह नहीं समझ रहे. यह भी कहा जा सकता है इसके पीछे उनकी अशिक्षा, अज्ञानता एक बड़ा कारण है. आश्चर्य मत करो, बात केवल एक उस महिला मंत्री की नहीं है, जो ठीक से शपथ तक नहीं ले पाती, या सीएम का संदेश तक ठीक से नहीं पढ़ पातीं. शेष कथित पढ़े-लिखे भी कहाँ कुछ समझ पा रहे हैं? यदि यह बात गलत है तो कोई बताये, देश के कर्णधार युवाओं के साथ यह कैसा मजाक किया जा रहा है? असल में देश को हर प्रकार से धड़ों में बाँट दिया गया है, अमीर-गरीब, हिन्दू-मुस्लिम. इसी दम पर बहरूपिये सत्ता पा बैठे हैं. और खुद को देश से ऊपर समझने वाले ये लोग सरकार चला रहे हैं.

75 पार का फार्मूला, ज्यादा देर नहीं टिक सकी खुशी
पिछले दिनों एक बात जोरों से उछली 75 पार का फार्मूला लागू किया गया है, के तहत मध्यप्रदेश में एक पार्टी विशेष में 2 बड़े दिग्गजों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. लगा था की एक अच्छा निर्णय हुआ है, लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी. बाद में बताया गया ऐसा कोई फार्मूला नहीं है और 90 साल का भी राजनीति करते रह सकता है. लोग कहते हैं स्वाभाविक भी है, जिसका एक पैर हमेशा कब्र में लटका होगा, कैसे देश के बारे में ठीक से अच्छा सोच सकता है? कोई भी काम की पहली सीढ़ी एक विचार से, सोच से ही शुरू होती है, लेकिन जब वह ही अच्छा नहीं होगा तो कैसे कुछ अच्छा होगा?

शिक्षा का मतलब क्या सिर्फ पेट पालने के लिए नौकरी?
यह भी कहा जा सकता है कि आज जो शिक्षा दी जा रही है, वह महत्वहीन है, क्योंकि वह बेरोजगार पैदा कर रही है. लेकिन यहाँ हमें यह भी विचार करना होगा कि शिक्षा का मतलब होता क्या है? क्या सिर्फ एक पेट पालने के लिए नौकरी? नहीं, शिक्षा का मतलब, सम्पूर्ण सही ज्ञान होता है, जो कि आज के आईएएस तक में नहीं देखा जा रहा. शिक्षा का मतलब केवल एक डिग्री नहीं होता, शिक्षा का मतलब ज्ञान से होता है. सही शिक्षा पाई है, सही से ज्ञान है तो वह मानव को एक अच्छा इंसान बनाती है, लेकिन इस बात की कमी हम देख रहे हैं. 

तिजोरियां भरने में लगे हैं, समाज उन्हें एक चड्ढी भी नहीं ले जाने देगा
हम देख रहे हैं बड़े लेवल पर आईएएस जैसी उच्च शिक्षा के बाबजूद मलाईदार पदों की तरफ भागते अधिकारी. हम देख रहे हैं पैसा के पीछे भागते बड़े-बड़े उच्च शिक्षित उद्दोगपति/राजनेताओं को. इन्हें ज्ञान ही नहीं है कि यह संसार उन्हें अपने साथ एक चड्ढी भी नहीं ले जाने देगा, लेकिन वह अपनी कोठियां अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं. घरों में नोट गिनने की मशीनें निकल रही हैं. रात भर सो नहीं पा रहे, लेकिन हवश ख़त्म नहीं हो रही. 

ज्ञान ही नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं? 
असल बात यह है कि इन्हें ज्ञान ही नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं? आपने यह तो सुना ही होगा कि एक चोर को सब चोर ही दिखते हैं, उसी तरह ये लालची लोग, सबको लालची समझकर सब कुछ मुफ्त में दे देंगे, 'ये भी मुफ्त लो, वो भी मुफ्त लो' कर कर के वोट कबाड़ना सीख गए हैं. उसके बाद अंधे होकर रह गए हैं और दिख कुछ नहीं रहा, बस चले जा रहे हैं एक गहरी खाई की ओर.

सड़ गया पूरा सिस्टम बदलना होगा
यही रह गया है हमारा सिस्टम, जिसे सिस्टम सड़ गया है, भी कहा जाने लगा है. आज इस सिस्टम को पूरा का पूरा बदलने की आवश्यकता है, अन्यथा यह सब चलता रहेगा. कभी कोई पार्टी जीत जाती है और कभी कोई पार्टी. बन जाती है उसकी सरकार. पर सच यही है कि सरकार में पूर्व से जमे लोग ही सरकार चलाते रहते हैं. तभी तो एक सरकार में पकौड़े तलने की योजना आती है तो सरकार बदलने के बाद भी उसी से मिलती जुलती ढोर चराने का प्रशिक्षण देने की योजना आ जाती है. यदि सरकार वास्तव में बदलती तो वैसा सोच भी बदलता, पर नहीं न. वास्तविक बदलाब के लिए पूरा सिस्टम बदलना होगा. शिक्षा में परिवर्तन करना होगा. या फिर ऐसी योजनाएं तो आगे भी आएंगी ही. 

और अंत में 
एक बात और सुनी होगी 'पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब'  पर ये बीते दिनों की बात है. अब आप कह सकते हैं 'पढ़ोगे लिखोगे बनोगे ख़राब, खेलोगे कूदोगे, और करोगे गुंडागर्दी तो बन सकते हो सांसद भी' 
- चित्रांश 


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