संज्ञाओं का अपहरण




- सुरेन्द्र रघुवंशी     
जो देश की सीमाओं पर और भीतर भी
देश की चौकीदारी रात-दिन कर रहे हैं 
सीने पर गोली खाकर शहीद होकर भी
गोलियां कभी उनकी पीठ पर नहीं पाई गईं

उनका कहीं जिक्र नहीं देश की चौकीदारी में
और वे जिन कृषक मजदूर परिवारों से आते हैं
उनका भी नहीं चौकीदारों की सूची में नाम
जबकि उनकी धरती परिश्रम के बीजों से
गर्भवती होकर देती आई है अनन्त फसलों को जन्म

वे कहते हैं कि हमारे अधिकारों का ही नहीं
हमारी संज्ञाओं तक का हो गया है अपहरण
हम अपनी समूची पीढ़ी के साथ 
अंधेरे में दिगम्बर खड़े हैं किंकर्तव्यविमूढ़
अपने हिस्से के उजाले का सूरज दैत्यों ने हथिया लिया है

इस दृश्य को भी इतिहास में गौरव की तरह
दर्ज़ करने की तैयारी है
जबकि खुशियों के रंग बिरंगे वस्त्र पहनने की इच्छा 
हमारी आंखों में पथरा गई है

हम ख़तरनाक अवसरवादी जंगल में धकेल दिए गए हैं
अथवा हमारा जहाज समुद्री डाकुओं ने घेर लिया है?
व्यवस्था के लुटेरे सरेआम लूट रहे हैं
विश्वास के काँच किरच-किरच टूट रहे हैं


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News Digital India 18

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