राजनीति में सब संभव है, यूपी में दो-दो हाथ, बिहार में गलबहियां?


''बसपा सुप्रीमों मायावती कांग्रेस से गठबंधन नहीं चाहती हैं, समझ में आता है, लेकिन वह जिस प्रकार से बिहार में राजद से नहीं कर रही हैं, वह समझ नहीं आता. उत्तरप्रदेश में जिस पार्टी से बसपा, सपा के साथ मिलकर दो दो हाथ करने जा रही है, वही बिहार में उसी पार्टी बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होगी. राजद से गठबंधन नहीं कर वोटकटवा ही साबित होगी. क्या यही राजनीति है? चूंकि राजनीति में सब संभव है, सो कहीं अंदरूनी गलबहियां तो नहीं?'' 





अमेठी से डॉ. रमेश यादवेंद्र     

बिहार में आखिर तेजस्वी यादव तो बहुजन समाज के लिए ही समर्पित हैं, तो वहाँ क्यों अकेले बसपा लड़ने जा रही है? ऐसे में सवाल उठ रहे हैं, क्या बिहार का बहुजन समाज यूपी की तरह इनके साथ खड़ा होगा? जबकि बहुजन समाज में तेजस्वी यादव की पकड़ बसपा सुप्रीमो से कई गुना अधिक है.  

चर्चा स्वाभाविक है, यूपी में अखिलेश यादव से सारे मतभेद भुला, गठबंधन हो गया, तो बिहार में तेजस्वी यादव से इतनी दूरी क्यों बनी है? उनके परिवार से तो कभी कोई मतभेद भी नहीं था. तो क्या यह माना जाए कि राजनीति में सब संभव है, सो अंदरूनी गलबहियां तो नहीं हो गईं? 

साफ़ कहा जा सकता है ऐसे में बिहार में तो बसपा वोटकटवा ही साबित होगी. यहाँ जो वोट बसपा को मिलेगा, वो भाजपा के खिलाफ राजद, कांग्रेस या अन्य दल, जो भाजपा की ख़िलाफ़त करने वाली पार्टियां हैं, को मिलता. साफ़ है बिहार में बसपा के अकेले अलग चुनाव लड़ने से भाजपा का लाभ होगा. भाजपा की ख़िलाफ़त करने वाली पार्टियां कमजोर होंगी. कहीं यह बसपा सुप्रीमों मायावती की अति महत्त्वकांक्षा तो नहीं या फिर यही माना जाए कि उत्तरप्रदेश में जिस पार्टी से बसपा, सपा के साथ मिलकर दो दो हाथ करने जा रही है, उसी पार्टी से बिहार में गलबहियां कर ली है. 

उल्लेखनीय है बिहार के प्रतिपक्ष नेता और राजद के युवा नेता तेजस्वी बसपा सुप्रीमों मायावती को पर्याप्त सम्मान देते रहे हैं. कुछ समय पूर्व तक पूरी तरह माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव में बसपा, राजद साथ साथ होंगे.    

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