युगेश्वर ठाकुर, जिन्होंने मानव सेवा का ज्ञान दिया और देशप्रेम में झूल गए



जिन्होंने मानव सेवा का ज्ञान दिया और देशप्रेम में झूल गए
उस महान विभूति को हम न जाने क्यों भूल गए। 
उन्होंने निभाया अपना फर्ज, हम भूल गए क्यों उनका कर्ज
वे थे एक सबल पक्ष, क्रांति की परिपाटी के 
भुला दिए गए भुल्लर बाबू, जो लाल थे अपनी माटी के 
विक्रम कुमार       

वैशाली के महान विभूति युगेश्वर बाबू उर्फ़ भुल्लर बाबू / जन्मदिवस - 25 जून 1900 ई/ पुण्यतिथि - 3 जनवरी 1984 ई

वैशाली। गणतंत्र की जननी। विश्व की प्रथम गणतंत्र भूमि। अपने पावन भूमि पर भगवान बुद्ध, राजा विशाल, सम्राट अशोक, भगवान महावीर, आम्रपाली जैसे हस्तियों की उपस्थिति से ओतप्रोत होकर जब यह अपने सफलतम एवं गौरवशाली सफर में आगे बढ़ी तो एक दो सौ वर्षों का दुर्गम पड़ाव आया जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। इस पड़ाव से चलने के बाद दो सौ वर्षों का मार्ग अत्यंत दुर्गम था लेकिन, वैशाली की धरा ने सदैव ही कठिनाइयों का सामना बड़े ही धीरज से किया था। इस धरती ने सदैव ही भारतवर्ष के इतिहास को गौरान्वित किया। यह भूमि कभी भगवान महावीर की जन्मधरा बनी तो कभी भगवान बुद्ध की कर्मभूमि, कभी राजा विशाल और सम्राट अशोक के सुशासन एवं प्रताप से लहलहायी तो कभी इस धरती पर आम्रपाली के घुंघरुओं की झंकार गूंजी। इन सभी उपलब्धियों से गुजरकर वैशाली ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के पथ पर कदम रखा। वैशाली की भूमि ने सदियों से ही संसार को कई वीर दिए थे फिर वह इस विकट घड़ी में कैसे पीछे रहती । सो इस घड़ी में इस भूमि ने अपने कई वीर सपूत दिए जिन्होंने भारत माता के नाम पर अपना सर्वस्व जैसे-घर परिवार, सुख चैन इत्यादि न्यौछावर कर तन मन एवं धन से देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रकार स्वतंत्रता के इस गंभीर संग्राम में वैशाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 

वैशाली की इस पावन धरती ने ललितेश्वर प्रसाद शाही, गुलजार पटेल, युगेश्वर प्रसाद ठाकुर ऊर्फ भुल्लर ठाकुर, रामचंद्र सम्राज, हरिहर सिंह, चतुर्भुज सिंह, सुदर्शन सिंह, अक्षयवट राय, बसावन सिंह और न जाने ऐसे कितने वीर सपूतों को अवतरित किया जिन्होंने पूरी सहभागिता से स्वतंत्रता आंदोलन में वैशाली की मिट्टी की सोंधी खुशबू बिखेर दी। इन वीरों ने भारतीय स्वाधीनता के लिए अपने घर परिवार, मां बाप और भाई बहन तक की परवाह नहीं की और भारत मां की आजादी के लिए जान की बाजी लगा दी। इन वीरों ने इस संग्राम में न जाने कितने कोड़े और लाठियां खाईं, जुल्म और यातनाएं सहीं। ये वीर निश्चित रुप से कृतसंकल्पित थे कि हमें देश के लिए जीना और मर जाना है, और इन्होंने वे सभी काम किए जो एक देश के लिए समर्पित क्रांतिकारी करते हैं। 

ऐसे ही एक वीर क्रांतिकारी थे-युगेश्वर प्रसाद ठाकुर ऊर्फ भुल्लर ठाकुर। श्री ठाकुर का जन्म वैशाली जिले के अंतर्गत पटेढ़ी बेलसर प्रखंड के एक छोटे से गांव मानपुरा में हुआ था। चूंकि जब श्री ठाकुर का जन्म हुआ था तब जमाना खास तौर पर गांवों की हालत काफी पिछड़ी हुई थी और उस वक्त के कई महत्वपूर्ण सेनानियों को देश याद ना रख सका उसी मे एक थे भुल्लर बाबू। मानपुरा की मिट्टी में जन्मे महान विभूति युगेश्वर बाबू का जन्म सन् 1900 ई. में हुआ था। वे बचपन से ही स्वछंद प्रवृत्ति एवं उन्मुक्त विचारों के थे। बचपन से ही वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे साथ ही वे त्याग, दया एवं करूणा की प्रतिमूर्ति थे । 

उन दिनों भारत में गरीबी और भूखमरी के चपेट मे था और जमींदारी प्रथा अपने चरम पर थी। युगेश्वर बाबू बचपन के दिनों से ही लोगों की समस्याओं को देखकर दुखी होते और हमेशा उनके निवारण की बात सोचते रहते। दिन बीते भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की रुप रेखा तैयार हुई। गांधी जी से प्रेरित होकर जब युगेश्वर बाबू स्वाधीनता संग्राम में कूदे तब उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष की थी। वर्ष 1917 युगेश्वर बाबू के संग्राम में आगमन का गवाह बनी। अपने कई साथियों एवं सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने कई आंदोलन किए। 1917-1921 तक गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने असहयोग आंदोलन, हरिजन आंदोलन, जमींदारी उन्मूलन आंदोलन जैसे कई आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। सब कुछ चलता रहा। दिन बीतते रहे। 1942 में गांधी जी के नारे "अंग्रेजों भारत छोड़ो"ने इनके खून में उबाल ला दिया। मानो इनमें नई जान फूंक दी गई हो। युगेश्वर बाबू दलबल के साथ अंग्रेजों को भारत छुड़ाने में जुट गए। आंदोलन के दमन के लिए अंग्रेजी पुलिस ने इन्हें इनके साथियों सहित गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। 

जेल में इन लोगों को असहनीय यातनाएं एवं पीड़ाएं दी गईं लेकिन इन वीर सपूतों ने उफ तक न किया क्योंकि इनलोगों ने देशप्रेम में जीवन का मोह बहुत पहले ही त्याग दिया। उन्हें देशप्रेम के आगे अपनी जान तक की परवाह नहीं थी। जेल में उन्होंने एक लम्बी और कष्टकारी अवधि व्यतीत की। भारत की आजादी के बाद वे जेल से बाहर आए और अपने गांव में रहकर अनवरत गरीबों, असहायों एवं जरुरतमंदों की सेवा करने की ठानी और आजीवन करते भी रहे। वर्ष 1971 में सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना के तहत उन्हें पेंशन देना शुरू किया। पेंशन की राशि को भी वे सामाजिक उत्थान में खर्च कर दिया करते थे क्योंकि देशप्रेम उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका था। 03 जनवरी 1984 को युगेश्वर बाबू का निधन हो गया। पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। सभी गमगीन हो गए। सभी ने भारी मन और नम आंखों से अपने मसीहा को विदाई दी। उनके निधन को स्थानीय बुद्धीजीवियों ने अपूरणीय क्षति.बताया जो कि एक अटल सत्य है। 

युगेश्वर बाबू पूरे समाज खासकर गरीबों, मजबूरों, लाचारों, किसानों इत्यादि की आशा और विश्वास थे। गरीब और असहाय उन्हें अपना भगवान मानते थे। 

धीरे-धीरे वक्त बीते, नई पीढ़ियां आई और युगेश्वर बाबू के देश और समाज के प्रति किए गए कार्यों को भूलने लगी तब उनके प्रपौत्र अमित कुमार एवं युवा संघर्षशील कवि साहित्यकार विक्रम कुमार ने मिलकर "स्वतंत्रता सेनानी भुल्लर ठाकुर स्मृति फाऊंडेशन" के नाम से एक संस्था बनाई। इस संस्था ने पटेढ़ी बेलसर क्षेत्र के कई स्थानों पर उनके पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी पावन स्मृति में पटेढ़ी बेलसर क्षेत्र के मनोरा राम जानकी मठ, श्री दुर्गा मंदिर सहित कई लोगों के दरवाजे पर पौधारोपण कर लोगों को उनके जीवन तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों को बताया , ताकि लोग अपनी माटी में जन्मे महान विभूति को जानें और युगों तक याद रखें। फाऊंडेशन के अध्यक्ष विक्रम कुमार के नेतृत्व में एक नि:शुल्क शिक्षण संस्थान"गुरुकुल"मनोरा की नींव रखी गई और उसमें प्रतिदिन छह घंटे की निशुल्क शिक्षा गरीब बच्चों को दिया जाना सुनिश्चित किया गया। उनके पुण्यतिथि की पूर्व संध्या एवं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली सभा का आयोजन किया जिसमें स्थानीय ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों एवं छात्र छात्राओं ने मोमबत्ती जलाकर तथा उनके तैलचित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी। तथा फाउंडेशन के सदस्यों ने संकल्प किया कि आगामी दिनों मे सभी सदस्य मिलकर 1000 पौधा अपने अपने स्तर से सभी इलाकों मे लगाया जायेगा। वहां उपस्थित सभी ने एक स्वर में कहा कि जब तक दुनिया है हम युगेश्वर बाबू के कार्यों को नहीं भूलेंगे। 

दुनिया को हम क्या बतलाएँ
कि वो महान विभूति कैसे थे
औरों के दुख में रो देते थे
युगेश्वर बाबू ऐसे थे। 
युगेश्वर बाबू अमर रहें। 




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