मध्यप्रदेश खेल संचालनालय यानि गंदे खेलों का विभाग?



''जब महिला खिलाड़ी का मामला सामने आया, तो स्टेडियम परिसर में खेल विभाग के विभिन्न अकादमी के सभी कोच व सहायक कोच व खेल विभाग के अधिकारियों के बीच बैठक करके सभी को समझाइश दी गई और उनकी राय ली गई। कहा तो यह जा रहा है कि 'गुड टच 'और 'बैड टच' के बारे में बताया जाए, लेकिन सही बात तो यह है कि चेतावनी दी गई है कि कुछ भी हो जाए, कोई मामला सार्वजनिक नहीं होना चाहिए। या मामला इतना न बिगड़े, कि विभाग की छवि धूमिल हो।''



संजय सक्सेना 

खेल विभाग में एक महिला खिलाड़ी के गर्भवती होने के बाद प्रसव और शिशु की मौत के मामले ने एक बार फिर मध्यप्रदेश खेल संचालनालय में गंदगी का प्रमाण दिया है, लेकिन अधिकारियों और सरकार की आंखें शायद फिर भी नहीं खुलने वालीं। जब भी कुछ होता है, निचले स्तर पर कार्रवाई करके लीपापोती कर दी जाती है, लेकिन जो वास्तव में इस विभाग के खिलाड़ी हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। यही कारण है कि यहां घोटाले-दर-घोटाले होते जा रहे हैं। 



19 वर्षीय महिला सेलिंग खिलाड़ी के एक बेबी को जन्म देने और उसकी मौत के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया था। तब जाकर खेल विभाग थोड़ा सा जागा और सख्त कार्रवाई करते हुए हॉस्टल की वार्डन नीलम मेश्राम व सहायक कोच अनिल शर्मा को निलंबित कर दिया गया। इसके अलावा प्रभारी वार्डन व जूडो कोच मोनिका परोचे को तत्काल प्रभाव से मुक्त कर बैतूल अटैच कर दिया है। कहा जा रहा है कि महिला खिलाड़ी को इसकी जानकारी ही नहीं थी। उसे पेट दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे प्रसव हुआ, लेकिन नवजात शिशु की मौत हो गई। यह प्रीमैच्योर प्रसव बताया जा रहा था।

स्टेडियम प्रभारी बता रहे हैं कि महिला खिलाड़ी की देखभाल के लिए महिला सहायक भी है। साथ ही न्यूट्रीशियन के अनुसार डाइट दी जा रही है, जिससे वह जल्दी स्वस्थ हो सके, जबकि इन प्रभारी महोदय की नियुक्ति ही घोटाले के तहत हुई है। प्रभारी के खिलाफ अदालत तक मामला गया, लेकिन विभाग के अधिकारियों ने जानबूझकर अदालत में लापरवाही की, जिससे केस खारिज हो गया। विभाग में करोड़ों रुपए के आर्थिक घोटाले उजागर हो चुके हैं। जांच के बाद सब दबा दिए जाते हैं। जो भी संचालक आता है, वो मामलों को दबाने का काम ज्यादा करता है। संचालक के अलावा जो विभाग के अधिकारी हैं, तमाम अनियमितताओं में फंसे हुए हैं। 

विभाग में नियुक्तियों पर ही सवाल उठते आए हैं, लेकिन सरकार में बैठे लोगों ने या तो पैसे लेकर मामले दबा दिए या फिर उन्हें किसी और माध्यम से खुश किया गया। यह बात इसलिए कही जा रही है कि एक-दो नहीं पचासों ऐसे मामले सामने आए, जिसमें खिलाडिय़ों और यहां तक कि कर्मचारियों तक के यौन शोषण के आरोप लगे, लेकिन सारे मामले दफन कर दिए गए। किसी का तबादला कर दिया जाता है तो किसी को कुछ दिन के लिए दूसरी जगह पदस्थ कर दिया जाता है। एक अधिकारी तो ऐसे हैं, जिनके लिए सरकार ने पद का ही सृजन किया, जबकि वह प्रतिनियुक्ति पर रहे और सर्वाधिक आरोपों में घिरे रहे। 



खिलाडिय़ों से लेकर तमाम अधिकारियों व कर्मचारियों ने आरोप लगाए, हो-हल्ला मचा, लेकिन शांत कर दिया गया। जिस विभाग में दस-बारह हजार वाले गद्दे 95 हजार में खरीदे गए हों, ट्रेक बिछाने में लाखों का घोटाला हुआ हो, भोपाल सहित प्रदेश के तमाम स्टेडियम बनाने में करोड़ों का घोटाला हुआ हो, करोड़ों के घोड़े खरीदने में लाखों रुपए कमीशन लिया गया हो, घोड़ों का अता-पता नहीं, उसके बारे में क्या कहा जाए? सूचना के अधिकारी के तहत लगाए जाने वाले आवेदनों पर धमकियां तक दी जाती हैं, बजाय जानकारी देने के। 

पूरा रैकेट ही चलता हो जिस विभाग में। फर्जी नियुक्तियों का सिलसिला चल रहा हो, वहां क्या उम्मीद की जा सकती है। परतें उधेड़ी जाएं, तो बहुत सारे मामले सामने आ जाएंगे, लेकिन यहां जो भी संचालक बनता है, पहले उसे कब्जे में लिया जाता है। फिर, मंत्री को। पिछला रिकार्ड यही रहा है। वर्तमान मंत्री भी स्टेडियम में जाकर अपनी खुशामद करवा चुके। ऐसे में किससे उम्मीद की जाए। खिलाडिय़ों के साथ क्या होता है, अंदर की कहानी बहुत दर्दनाक भी है। और तमाम टीमें ऐसी भी हैं, जहां फर्जी खिलाडिय़ों भी एडजस्ट किया जाता है। फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर दर्जनों नौकरी कर रहे हैं, खेलना भले ही न आता हो। मेडल और उपलब्धियों की भी लंबी कहानी है। पच्चीस प्रतिशत से ज्यादा प्रदेश के खिलाड़ी ही नहीं हैं। 

जब महिला खिलाड़ी का मामला सामने आया, तो स्टेडियम परिसर में खेल विभाग के विभिन्न अकादमी के सभी कोच व सहायक कोच व खेल विभाग के अधिकारियों के बीच बैठक करके सभी को समझाइश दी गई और उनकी राय ली गई। कहा तो यह जा रहा है कि गुड टच और बैड टच के बारे में बताया जाए, लेकिन सही बात तो यह है कि चेतावनी दी गई है कि कुछ भी हो जाए, कोई मामला सार्वजनिक नहीं होना चाहिए। या मामला इतना न बिगड़े, कि विभाग की छवि धूमिल हो।




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