देवर हो या जेठ सभी को लाल-पीला, हरा-गुलाबी कर देती हैं, रंग-गुलाल में लबरेज यहाँ की महिलायें



'आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया.. बड़ झोली रे रसिया..'' अपने अपने घर से निकली कोई गोरी, कोई काली रे रसिया ...
- रेनू मनोज  
अगर बात की जावे महिलाओं की होली की, तो विशेषकर हमारे भरतपुर राजस्थान में तो अभी होली के आखरी पड़ाव पर सभी महिलाऐं अपने अपने घरों से निकल एक टोली बना लेती हैं और फिर शुरू करती हैं यह लोकगीत, 'आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया.. बड़ झोली रे रसिया..'' अपने अपने घर से निकली कोई गोरी, कोई काली रे रसिया का गीत मल्हार गाती हुई पूरी कॉलोनी और गलियों में चक्कर काटती हैं. 



टोली प्रत्येक के घर के स्वादिष्ट पकवानों का जायका लेती हुई आगे बढ़ती जाती है. होली का हुड्दंगा इतना सवार होता है खोपड़ी पर, कि देवर हो या जेठ सभी को लाल-पीला, हरा-गुलाबी कर देती हैं. रंग-गुलाल में लबरेज यह महिलायें कीचड़ और गोबर भी नहीं छोड़तीं. हुलयारी मस्ती में अगर यह हाथ पड़ जाऐ तो यह भी छाप ही देती हैं कस कर. 

उस दिन तो यही महसूस होता है कि यह कहना गलत होगा कि भारत पुरुष प्रधान है, यहां तो भाभियां, मां, चाची, ताई और दादी का गुट अच्छे अच्छे अक्लमंद पुरुषों के छक्के छुड़ा देती हैं, हहहहहह..




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