मोटी आंटी



कहानी  

''मैंने पीछे मुड़ कर देखा, ऊम्र के लिहाफ से झांकता झुरीदार चेहरा और उदास, गहरी, स्नेह के परिपूरित दो आँखें, मुझे ऐसे लालसा से देख रही थी, जैसे मेरे दो पराठे खा लेने से उनके व्यथित मातृत्व को थोड़ी देर की शान्ति मिल जाएगी. जैसे मेरे ये कह भर देने से कि 'आंटी पराठे बड़े स्वाद बने हैं' उन्हें अपने अमेरिका में डॉलर कमाने में व्यस्त एकलौते बेटे का प्रेम और सम्मान मिल जायेगा.''  
इसी कहानी से... 

  - अपराजिता 'नेहा'



नेहा हो क्या? मोटी आंटी ने सीढ़ियों से उतरते हुए में पैरों की आहट सुनकर ज़ोरदार आवाज़ में पूछा. 

हाँ! आंटी.. नेहा ही हूँ .. मैंने उनके अजीबोगरीब पीले रंग के दरवाज़ों के पल्ले से झांक कर कहा. 

"मैं किचन में हूँ बच्चे, इधर आ जाओ." 

नहीं, आंटी, क्लास के लिए देरी हो रही है, मैं थोड़ा भागती हूँ. 

अरे, सुनो तो! देसी घी के पराठे बनाये हैं, बड़े स्वाद बने हैं, एक खाती जाओ. 

मैंने मन में सोचा आज फिर ये "बड़े स्वाद बने-बड़े स्वाद बने" कह कर, आधी क्लास निकलवा देंगी, सो झट से कहा "नहीं आंटी, आज लेट हो गयी हूँ, और अभी-अभी ब्रेड ओम्लेट खाया है, मैं भागती हूँ. तब तक वो भी दरवाज़े तक आ गयी थी, मायूस हो कर कहा, ठीक है जा, क्लास में देरी अच्छी बात नहीं, पर कभी-कभी अपने मन से आ जाया कर, चार सीढ़ियों का ही तो फासला है. 

रोज़ तो आती हूँ, मैंने रफ़्तार से सीढ़ियाँ उतरते हुए कहा. 

सुन! आज रात आलू पराठे बना दूँ तेरे लिए? 

मैंने पीछे मुड़ कर देखा, ऊम्र के लिहाफ से झांकता झुरीदार चेहरा और उदास, गहरी, स्नेह के परिपूरित दो आँखें, मुझे ऐसे लालसा से देख रही थी, जैसे मेरे दो पराठे खा लेने से उनके व्यथित मातृत्व को थोड़ी देर की शान्ति मिल जाएगी. जैसे मेरे ये कह भर देने से कि 'आंटी पराठे बड़े स्वाद बने हैं' उन्हें अपने अमेरिका में डॉलर कमाने में व्यस्त एकलौते बेटे का प्रेम और सम्मान मिल जायेगा. 


पीले फूलों की बूटियों वाला सलवार कुर्ता पहने, पीले दरवाज़े से टिकी मोटी आंटी में मुझे अपनी माँ का चेहरा एक बार फिर दिख गया, और मैंने कहा "मक्खन ऊपर से लुंगी, ठीक न!", वो मुस्कुरा दी.

उन दिनों मैं अपने 'सिविल परीक्षा' की तैयारी के लिए 'गुरु तेग बहदुर नगर' की एक पुरानी रिफ्यूजी कॉलोनी में रहती थी. हाउस नंबर 366 के पहले माल्हे पे था मोटी आंटी का घर, जिस घर के अजीब पीले दरवाज़ों के पीछे 65-70 साल की विधवा अकेले ही अपने जीवन-यात्रा के आखिरी पड़ाव की तपिस झेल रही थी, अंतहीन सूनापन और असीम इंतज़ार लिए.पहले तो मुझे यूँ लगता था कि आंटी का कोई है ही नहीं। ये भी सोचती थी, क्यूँ उन्होंने अपनी जिन्दगी दुबारा शुरू नहीं की? क्या उनके कोई सपने या अरमान नहीं होंगे? 

फिर, नुक्कड़ वाली 'गुप्ता अंकल की दुकान' से पता लगा कि कुछ 27-30 साल की होंगी मोटी आंटी, जब परमिंदर अंकल 1984 के सिक्ख दंगों में मारे गए थे, और पीछे छोड़ गए थे आंटी और अपने एक साल के बेटे को. प्यार तो लुट गया था, पर एक साल का बेटा और दायित्व से भरी जिन्दगी उनका इंतज़ार कर रही थी. तब समझी थी कि कैसे उन्हें जिन्दगी को अकेले ही आड़े हाँथ लेना सीखना पड़ा होगा. 

उस दिन मेरा मन मोटी आंटी के चरित्र और मातृत्व के सामने नतमस्तक हो गया, क्यूंकि अपने जिन्दगी की खुशियों को होम करने में संतोष की अनुभूति सिर्फ एक औरत ही कर सकती है.तब जाना था कि आंटी का एक निर्मोही बेटा भी है। तब समझ पाई थी, आंटी की पलके अक्सर क्यूँ भीगी रहती हैं, और क्यूँ वो अपने मोबाइल फ़ोन से एक मिनट की दूरी भी बर्दास्त नहीं कर पाती.यदाकदा उनके भाई फ़ोन करते थे, फिर भी उन्हें जैसे हर मिनट किसी के फ़ोन का इंतज़ार रहता था.

एक दिन मैंने कह ही दिया,'आंटी आप ये मोबाइल हर वक्त क्यूँ पकड़े रहती हैं रख दीजिये ना'. पता नहीं उन्हें क्या हुआ बहुत नाराज़ होकर बोली "तुम लोग जो चाहो कर सकते हो, मैं मोबाइल भी नहीं पकड़ सकती". 

अब समझ पाती हूँ कि एक बूढी, बेबस, लाचार माँ से इंतज़ार का हक छिनने की जुर्रत कर दी थी मैंने. बस इंतज़ार और आस ही तो था जिसके बल पर वो आज भी जिन्दा थी, बिना किसी से शिकायत किये. अब पता लगा था वो अक्सर क्यूँ कहती थीं "अपने माँ-पापा का ध्यान रखना नेहा, क्यूंकि जीवन का चक्का घूमता है, कर्त्तव्य कई अरमानो की बलि लेती है, फिर दिल का टुकड़ा भी तवज्जो न दे तो मन दुखता है और हर दिन जड़ कमजोर होती है."

एक दिन मैंने उनसे कहा "ये चमकीले पीले रंग का दरवाज़ा कौन रखता है आप इसे बदलती क्यूँ नहीं?" उन्होंने रुधे हुए गले से कहा 'पिला तो 'भूपी' का पसंदीदा रंग है, ये नहीं बदलूंगी'. मुझे ऐसा लगा जैसे एक मासूम सी बच्ची अपनी परियों की दुनिया से बाहर आना ही नहीं चाहती हो।

उस रात लौट कर जब मैं मोटी आंटी के पास गयी तो वो नहीं थीं, मुझे लगा मोहल्ले में कही गयी होंगी. अगली सुबह मैंने दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ सुनी तो देखा उनके भाई एक झोले में कुछ कपडे और चादर, लिए जा रहे थे. 

मैंने पूछा आंटी कहाँ हैं? आप ये कपडे क्यूँ ले जा रहें है? 

उन्होंने रूआसे हो कर कहा कि कल दोपहर से वो 'गंगाराम अस्पताल' में भर्ती हैं, नींद की गोलियां खा ली उन्होंने. मैं सकते में आ गयी। मैंने पूछा "ऐसा अचानक क्या हुआ? सुबह ही तो मिली थी!।" 

उन्होंने बताया कि पिछले 11 साल से वो रोज़ दोपहर एक बार भूपेंदर को फ़ोन जरूर करती थीं, और पूछती थीं 'कब आओगे' वो हर बार कहता 'आऊंगा, अभी काम है'। कल शायद उसने कह दिया कि 'इंडिया में रखा क्या है ... मैं कभी नहीं आऊंगा... और तुम मुझे चैन से जीने दो'. वो फफक पड़े, और कहने लगे 'क्या उसने अपनी पूरी जिन्दगी का बलिदान यही सुनने के लिए किया था'. मेरी आँखें भी अनायास ही बरसने लगीं.

मैंने कहा रुकिए! मैं भी चलती हूँ. हम वहां पहुंचे तो सही, पर मोटी आंटी नहीं थी, वो जा चुकी थी और उनकी खुली ऑंखें अब भी उस बेटे का इंतज़ार कर रही थी. सहसा उनका मृत हाँथ फ़िसलकर मेरे हांथों से टकराया जैसे पूछना चाहता हो 'पराठे स्वाद बने हैं?' जैसे उनकी खुली ऑंखें कह रही हों 'अपने माँ-पापा का ध्यान रखना नेहा, क्यूंकि जीवन का चक्का घूमता है, कर्त्तव्य कई अरमानों की बलि लेती है, फिर दिल का टुकड़ा भी तवज्जो न दे, तो मन दुखता है, और हर दिन जड़ कमजोर होती है.'




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