इतने ज़ाहिल हैं समाज के ठेकेदार, सामाजिक और शासकीय हस्तक्षेप जरूरी

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अनाथ आश्रम में जब कोई नवजात बच्चा आता है तो उसकी कोई जाति नहीं होती, फिर उसके बड़ा होने पर स्कूल में डालते वक्त उसके सरनेम जाति की आवश्यकता होती है, क्योंकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि हम उसे केवल भारतीय ही रहने दें, कोई जाति के बंधन में न बांधें, पर ऐसा है नहीं, तब देखिये क्या है उसकी जाति, उसका सरनेम तैयार करने का तरीका? 
-कैलाश वानखेड़े   

अनाथ आश्रम में नवजात बच्चों के सरनेम रखते वक्त उसका रंग रूप देखा जाता है. इसके अलावा जो बच्चे बोलने वाली उम्र के होते हैं, उनसे सामान्य जानकारी को लेकर बात की जाती है. बच्चों के द्वारा दिए गए जवाब और रिस्पांस के आधार पर तय किया जाता है कि उसे सवर्ण सरनेम मिलेगा या दलित.

ऐसा करने वाले अनाथालय के लोग इसे 'आई क्यू' टेस्ट कहते हैं और जिसका 'आई क्यू' या रंग गोरा होता है, उसे सवर्ण बनाया जाता है. इस तरह दर्ज हो जाती है उसकी जाति...

अनाथ आश्रम के भीतर इस तरह हर हाल में जाति व्यवस्था को कायम रखते हुए उसे निर्धारित करने के 'मानक' स्थापित किये जाते हैं. आश्रम संचालक बड़ी  बेशर्मी से कहते हैं, यह उनका अधिकार है. इस बारे में कोई सरकारी नियम न होने से भी वे ऐसा करते है.

अनाथ आश्रम संचालन मानव सेवा ही मानी जाती है, और वहां इस तरह से जाति-जाति का घिनौना खेल खेला जाता है?

वह मानव जिसकी जाति पता नहीं, उसकी जाति तय करने का यह हिंसक, बर्बर अमानवीय तरीका अपनाया जाता है ...

मामले में श्री मोतीलाल अहिरवार ऐसे लोगों के लिए सामाजिक स्तर पर और शासकीय हस्तक्षेप जरूरी बताते हैं. 





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