चौकीदारी


''जब समाज का असल चौकीदार गहन चिकित्सा कक्ष में था, ख़ुद को समाज के चौकीदार कहने वाले लोग चैन की नींद लेने की तैयारी कर रहे थे...''
- रोली अभिलाषा 
एक तो दफ्तर का काम ऊपर से रास्ते का जाम. शायद कुछ हुआ था. रास्ता बनाते हुए अंदर जाकर देखा तो चेहरे पर खून की वजह से पहचान न सकी. पूछने पर पता चला अभी कुछ देर पहले तेज गति से आई एसयूवी गाड़ी फुटपाथ पर चल रहे सायकिल सवार को टक्कर मारते हुए निकल गई. एम्बुलेंस का नंबर लगाया पर कोई फायदा नहीं. कोई मदद करने को तैयार न हुआ.



ऑटो बुलाकर किसी तरह अस्पताल तक पहुंचाया. डॉक्टर रिपोर्ट लिखवाने की बात पर अड़ा था और मुझे जान बचाने की फ़िक्र थी. अपने मित्र की मदद से मुख्य क्षेत्राधिकारी के कार्यालय में स्थित अधिकारी से डॉक्टर की बात कराई तब इलाज शुरु हुआ. मैं आपतकाल कक्ष के बाहर प्रतीक्षा कर ही रही थी तभी स्ट्रेचर दिखाई दिया..."अरे यह क्या ये तो वॉचमैन अंकल हैं" मेरे मुंह से निकला तभी उन्होंने मुझे देखकर अपने हाथ जोड़ने चाहे पर अचेत हो गए.

"मैडम बहुत अच्छा हुआ जो आप समय रहते इन्हें यहां ले आईं. हमें इन्हें आई सी यू में शिफ़्ट करना होगा पर..."
"पर क्या डॉक्टर?"
"इनके घर का कोई आ जाता तो..."

"क्या कहना चाहते हैं आप... इन्होंने इतनी ज़िन्दगी हमारी सेवा की, क्या हम इतना नहीं कर सकते. पैसों की चिंता मत करिए आप. समझिए मैं इनकी बेटी हूं."

समाज का असल चौकीदार गहन चिकित्सा कक्ष में और मैं बाहर उनकी चौकीदारी कर बस यही सोच रही थी कि बिना किसी नंबर के घर वालों तक कैसे पहुंचा जाए. ख़ुद को समाज के चौकीदार कहने वाले लोग चैन की नींद लेने की तैयारी में थे. 
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1 comments:

  1. शुक्रिया मेरी कहानी को स्थान देने के लिए. क्या फलक समूह इसकी अनुमति देता है?

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