सरकार ही नहीं, देश में जनता भी असफल हो रही है और समाज भी


हो सकता है इस अवधारणा की अभिव्यक्ति कर पाना मुश्किल हो, क्योंकि हम लोग इस तरह सोचने के आदी नहीं हैं, लेकिन अगर गहराई से सोचें तो सिर्फ सरकार या सरकारें ही असफल नहीं हो रहीं. आम जनता के रूप में भी और एक समाज के रूप में भी हम भी असफल हो रहे हैं.

मसलन रोजमर्रा की जिंदगी की हमारी जितनी समस्याएं हैं, उनमें 50 फीसदी से ज्यादा हमारी अपनी वजह से हैं और हम सरकार या सरकारों को दोष दे रहे हैं. उदाहरण के लिए गंदगी और अवैध कब्जे की समस्या को लें. नदियों, तालाबों की दुर्गति की समस्या को लें, मिलावट की समस्या को लें, सरकारी स्कूलों में छात्रों की उद्दंडता और अध्यापकों की काहिली की समस्या को लें. इन सबको सही करने में पूरी तरह से नहीं तो एक हद तक हमारी भी भूमिका की दरकार है, लेकिन हम कहाँ यह मानने को तैयार हैं?

- लोकमित्र गौतम   

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