विधायकों को नाथ की सत्ता पर भरोसा नहीं, सत्ता बदलाव के डर ने रेत के धंधे में कुदवाया


''कांग्रेसी विधायकों और पदाधिकारियों को अपनी सरकार की स्थिरता पर ही भरोसा नहीं है। कहा जाता है कि विधायकों की सोच है कि लोकसभा चुनाव के बाद नाथ सरकार पर संकट आ सकता है। इसलिये चुनावी खर्चे को किसी तरह इस रेत के कारोबार से भरपाई किया जा सके।'' 



छतरपुर से धीरज चतुर्वेदी 

निजाम बदले, लेकिन रेत का काला कारोबार आज भी बदसूरत होता हुआ नदियों के दिल को छलनी कर रहा है। इस कारोबार में पहले भी कांग्रेस के पूंजीपति और दंबग, भाजपा के दिग्गजों से हाथ मिलाये थे, पर अब तो सत्ता की धमक से केन नदी को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यही राजनीति होती है, जिन कमलनाथ ने रेत के अवैध कारोबार को अपना चुनावी मुद्दा बनाया था, उनके सत्ता संभालते ही बुंदेलखंड के विधायक और उनके दल के जिम्मेदार पदाधिकारी अपनी धमक से सीधे नदियों का चीरहरण कर रहे हैं. 

बेहद शर्मनाक कहा जायेगा, जो कांग्रेसी पहले रेत के काले कारोबारियों पर आरोप लगाते थे, वे आज खुद काली कमाई का हिस्सा बन चुके हैं और प्रशासन कठपुतली की तरह नाच करता दिख रहा है। कहा जा सकता है कि सत्ता के निजाम बदले, पर रेत के अवैध कारोबार पर कोई लगाम नहीं लग सकी. सरकार बदली तो अब रेत का अवैध तानाबाना करने वालों की सूरत भी बदल गई. वो आज भी सत्ता को अपनी जागीर समझते हुये, उन नदियों पर प्रहार कर रहे हैं, जो जीवनदायिनी हैं. 

वाह रे बुंदेलखंड में रेत का कारोबार, जो सत्ता के साथ चेहरे बदल देता है। आरोप है कि कांग्रेस के क्षेत्रीय माफिया ताकतवरों पर कुछ विधायकों और पदाधिकारियों की हिस्सेदारी ने उन्हे और दम दे दी है। यही कारोबार भाजपा के समय बदस्तूर चलता रहा। तब कांग्रेसी, भाजपा को छलनी किया करते थे, लेकिन अब तो सत्ता आते ही खुद कांग्रेसी अपनी काली कमाई को बढ़ाने इस उस साम्राज्य में शामिल हो गये हैं, जो आने वाली पीढ़ी के साथ खिलवाड कर नदियों यानि अपनी मां का कलेजा छलनी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। 

महत्वपूर्ण है कि कांग्रेसी विधायकों और पदाधिकारियों को अपनी सरकार की स्थिरता पर ही भरोसा नहीं है। कहा जाता है कि विधायकों की सोच है कि लोकसभा चुनाव के बाद नाथ सरकार पर संकट आ सकता है। इसलिये चुनावी खर्चे को किसी तरह इस रेत के कारोबार से भरपाई किया जा सके। यह कितना सत्य है यह तो रेत कारोबार की जांच का हिस्सा है, लेकिन यह तय है जिस तरह प्रशासन औपचारिक रूप से कार्यवाही कर रहा है, वो किसी दबाब से कम नहीं दिखता। तो क्या यह समझें कि प्रशासन भी, भाजपा सत्ता की तरह लंगड़ा बनने के आरोपों में फंसा है, यह कहा नहीं जा सकता, किंतु सच भी सार्वजनिक तौर पर अपनी दम भरता है।

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