निर्वाचित प्रतिनिधियों की भी रिटायरमेंट तिथि तय की जाए



''कहने को भारत को युवाओं का देश कहा जाता है, लेकिन यह देखकर अचरज होता है कि युवाओं के लिए कुर्सी छोड़ने के लिए यहां बमुश्किल ही कोई तैयार होता है। राजनीति को ही लीजिए - संसद और विधानमंडलों में दो तिहाई से अधिक संख्या साठ वर्ष पूरे कर चुके बुजुर्गों की है!''



अनिल शूर आज़ाद

एक सवाल जहन में आता है, जैसे विविध कर्मचारियों, शिक्षक, कलेक्टर, डॉक्टर, फ़ौजी, जज आदि की रिटायरमेंट की आयु 58, 60 या 65 वर्ष तय है - ऐसा कुछ निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति क्यों नहीं हो सकता? बढ़ती उम्र के चलते जो ढ़ंग से चलफिर तथा बोल तक नहीं सकते, वे जनप्रतिनिधि बनने की ज़िद पर क्यों अड़े रहें? चलो.. साठ न सही, पैंसठ, सत्तर या फिर.. अधिकतम पिछहत्तर रख ली जाए!

सांसद हो, विधायक हो, या फिर पार्षद ही हो - जिस तिथि को वह अपनी आयु के साढ़े सात दशक पूर्ण करे - पूरे सम्मान एवं देश की ओर से धन्यवाद सहित उसी दिन उसे घर लौटा दिया जाए, ताकि अपेक्षाकृत नौजवान आगे आकर उस स्थान को संभाल सकें। नहीं क्या?

क्या अपनी नई पीढ़ी के लिए हम इतना भी सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं?
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News Digital India 18

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