... और फिर रखा गया मकान का नाम 'स्वतंत्रता संग्राम'





''शाम को जब स्कूल से आयी तो देखा मेरा खेत तबाह हो चुका था। मकान मालिक की भैस ने आराम से सब खा लिया था। और उसके बाद...''





संस्मरण/ भावना भट्ट 

बहुत ही छोटी थी मैं। गाँव में एक किराये के घर में बाबूजी माँ और दो भाई के साथ रहती थी। मेरा मन हमेशा चाहता कि आँगन में कुछ फुलों के पौधे हों. एक छोटा सा खेत बनाती और उसमें कभी गेहूँ तो कभी गेंदे के बीजों को बो देती, उसी आशा से हर सुबह देखती रहती गेहूँ के अंकुरण को, की कल शायद गेहूँ की बालियां आ जायेंगी। गेंदे के पीले फूलों से मेरा खेत लहरायेगा। माँ मना करती थी उन सब के लिये, क्यूँ कि वो जानती थी, मकान मालिक के स्वभाव को। और मैं ना समझ थी।



शाम को जब स्कूल से आयी तो देखा मेरा खेत तबाह हो चुका था। मकान मालिक की भैस ने आराम से सब खा लिया था।

बहुत ही सहम गई थी मैं, मगर माँ और बाबूजी भी चुप थे। ऐसे चुप उनको बहुत बार देखा था। कभी ज्यादा कपड़े धोये हों या फिर तब जब ज्यादा मेहमान हों।

जब जब मकान मालिक का मन चाहा किराये का कमरा बदल दिया जाता था। हम सब बड़े हो रहे थे और कमरा दिन-ब-दिन छोटा हो रहा था।

चुप्पियों के साथ वक़्त कट रहा था और एक दिन माँ और बाबूजी स्कूल से लौटे तो मकान मालिक का फ़रमान झूले पर बैठा इन्तज़ार कर रहा था।

पूरी रात माँ और बाबूजी को चुपचाप बैठे हुए चिंता में मग्न देखा था। एक ही महीना था और कोई नया मकान का इंतजाम करना था। मकान मिलना गाँवों में थोड़ा कठिन भी था।

‎मैं उस वक़्त काफी बड़ी हो चुकी थी। मैनें आहिस्ता से मगर सटी हुई आवाज़ के साथ कहा कि जब तक हम शहर में अपना खुद का घर नहीं बना लेते, तब तक मैं शादी नहीं करूंगी और दूसरी बात शादी में कोई फ़िजूल खर्च करना नहीं है। मगर मेरी डोली अपने ही घर से उठेगी। बाबूजी मुझे एक घर चाहिए, जिसे मैं अपना कह सकूँ।

पास के ‎शहर में मकान बनना शुरू हुआ। संबंधियों से सहयोग भी लिया गया और एक साल में हम खुद के घर में रहने आ गये।

घर का नाम क्या रखा जाय? भाई ने मुस्कुराते हुए कहा कि बाबूजी की इच्छा भले ही 'सहयोग' की हो, मगर मकान का नाम तो 'स्वतंत्रता संग्राम' रखना चाहिए। हँसी की फुलझड़ियाँ बिखर गईं  और मैं आँगन में कहाँ, कौन सा पौधा लगाना है, उसी ख़याल में खो गई।  
भावनगर, गुजरात 





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1 comments:

  1. धन्यवाद आ. मुकुट सक्सेना जी

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