नई योजना, नया मुद्दा, नई बहस..


''अपनी इस नई योजना के लिए यदि कांग्रेस देश के एक प्रतिशत सुपर अमीरों पर टैक्स बढ़ाती है तो यह एक नई शुरुआत होगी। भारत जैसे देश में, जहां आर्थिक असमानता बढऩे की रफ्तार भीषण है, गरीबों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी करना बेहद जरूरी है। सामाजिक असंतोष को कम करने का यह एक बेहतर तरीका हो सकता है।'' 


संजय सक्सेना     

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्यूनतम आय गारंटी योजना की घोषणा करके देश में एक नई बहस तो प्रारम्भ कर ही दी है। एक ओर तो इसके चलते यह चुनाव राष्ट्रवाद के भावनात्मक मुद्दे से हटकर सामाजिक-आर्थिक मुद्दे पर केंद्रित होता दिखने लगा है। दूसरी ओर कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी भाजपा के साथ ही केंद्र सरकार के नीति आयोग ने भी इस पर सवाल उठाए हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि देश में आर्थिक मुद्दों को जिस तरह से हाशिए पर ले जाया जाता रहा है, उसमें परिवर्तन तो होना ही चाहिए। 

दुनिया की सबसे बड़ी योजना कही जाने वाली इस योजना का चुनाव पर असर से इनकार नहीं किया जा सकता। कहा तो यह जा रहा है कि यह योजना भाजपा सरकार द्वारा किसानों को सालाना छह हजार रुपए देने की घोषणा का जवाब है, लेकिन देखा जाए तो यह एक दूरगामी व्यवस्था की शुरुआत है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषणा की कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आई तो सबसे गरीब बीस प्रतिशत परिवारों को हर साल 72 हजार रुपए दिए जाएंगे। इस सहायता राशि को सीधे गरीबों के खातों में हस्तांतरित किया जाएगा और 5 करोड़ परिवार अथवा करीब पच्चीस करोड़ लोग इससे लाभान्वित होंगे। 

इस ऐलान के पीछे नोबल पुरस्कार विजेता दो विदेशी अर्थशास्त्रियों के साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रधुराम राजन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। रघुराम राजन भले ही आज पद पर नहीं हैं, लेकिन पक्ष हो या विपक्ष उनकी योग्यता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। इस घोषणा से राजनीतिक क्षेत्रों में तो खलबली है ही, केंद्र और भाजपा से जुड़े अर्थशास्त्री भी मंथन करने में जुट गए हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने तो खुलकर आलोचना कर दी थी। हालांकि उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस भी दे दिया, लेकिन आज सबके सामने यही सवाल है कि इस योजना के लिए संसाधन कहां से लाए जाएंगे? 

हालांकि राहुल गांधी का दावा है कि उन्होंने इसका पूरा खाका तैयार कर लिया है। अनुमान है कि करीब 3 लाख 60 हजार करोड़ रुपये का खर्च इस पर आएगा, जो कुल बजट का लगभग तेरह प्रतिशत होगा। यह राशि जीडीपी की लगभग दो प्रतिशत होगी। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह सहायता उन सब्सिडियों की जगह दी जाएगी, जो वर्तमान में लोगों को दी जा रही हैं, या फिर उनके अतिरिक्त होगी? फिलहाल सरकार 35 तरह के अनुदान जनता को उपलब्ध करा रही है। इन सभी सब्सिडियों के साथ न्यूनतम आय योजना को लागू करना बेहद कठिन होगा। यह तभी लागू हो सकती है, जब ये अनुदान कम या खत्म किए जाएं। लेकिन अभी जो सहायता दी जा रही है, वह भी समाज के कमजोर वर्ग के ही लिए है। इनमें कटौती से कुछ तबकों में आक्रोश फैल सकता है। ऐसे में अतिरिक्त राशि जुटाने का एक तरीका नए टैक्स लगाने का हो सकता है। दुनिया के कई देशों में अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाकर उससे कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं। 

कभी कांग्रेसी शासन में वित्त मंत्री रहे प्रणव मुखर्जी ने इस तरह की कोशिशें की थीं, पर वे अपर्याप्त साबित हुईं। लेकिन यह सच्चाई है कि भारत का सुपर रिच तबका अभी अपने सामर्थ्य के अनुपात में बहुत कम टैक्स देता है। तमाम सरकारें टैक्स के नाम पर नौकरीपेशा मध्यम वर्ग को ही निचोड़ती आ रही हैं। अमीरों को तो बड़ी मात्रा में छूट तक वर्तमान मोदी सरकार ने दी है। जितना उन लोगों ने टैक्स नहीं दिया होगा, उससे ज्यादा राहत दे दी गई। इससे दो घाटे हुए। एक तो सरकार का खजाना नहीं भर पाया, दूसरे बैंकों की कमर भी टूटती जा रही है। यह सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति है। हालांकि यह भी है कि कांग्रेस ने इसे चुनाव के दौरान घोषित किया है, इसलिए इसका विस्तृत ब्यौरा सामने नहीं आया है। 

यदि रघुराम राजन और दो नोबल विजेता अर्थशास्त्रियों ने यह योजना बनाई है, तो निश्चित तौर पर उन्होंने व्यवस्था करने के उपाय भी बताए ही होंगे। अपनी इस योजना के लिए यदि कांग्रेस देश के एक प्रतिशत सुपर अमीरों पर टैक्स बढ़ाती है तो यह एक नई शुरुआत होगी। भारत जैसे देश में, जहां आर्थिक असमानता बढऩे की रफ्तार भीषण है, गरीबों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी करना बेहद जरूरी है। सामाजिक असंतोष को कम करने का यह एक बेहतर तरीका हो सकता है। यही कारण है कि भाजपा सहित अन्य विरोधी दलों में इस योजना की घोषणा से ही घबराहट फैलती दिखने लगी है। देखना यह होगा कि देश की जनता आतंकवादी हमले, एयर स्ट्राइक को ज्यादा महत्व देती है या फिर सामाजिक असमानता दूर करने वाली इस महत्वाकांक्षी योजना को।

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