माफी से काम नहीं चलेगा सरकार, 'वचन' देना होगा, उम्र 60 कर बेरोजगारों को अवसर दे सरकार




''कर्मचारी संगठनों के नेताओं का कहना है कि नई कांग्रेस सरकार यह 2 वर्ष की बड़ी हुई अवधि के आदेश वापिस करे और कम से कम यह तो किया ही जाना चाहिए कि कर्मचारियों को विकल्प चुनने का अधिकार दिया जाए. कोई कर्मचारी जब सेवा में आया, तब उसके लिए 60 वर्ष की सेवा अवधि की शर्त थी, लेकिन अब जब सेवा अवधि बढ़ाई जाती है तो उसमें उसकी सहमति आवश्यक क्यों नहीं?''



भोपाल से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. अपनी जीत सुनिश्चित करने उन्होंने बाकायदा मोर्चा भी संभाल लिया है, साथ ही वे पूर्व की गलतियों से बचना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने एक कार्यक्रम में कर्मचारियों से माफी भी मांग ली है. लेकिन कई कर्मचारी नेता कह रहे हैं माफी से काम नहीं चलेगा सरकार, वादे कीजिये कर्मचारी हित के सही सही. इस तरह का मैसेज सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है. 

'MP Vidhansabha 2018 se Lok Sabha 2019' facebook पेज पर मैसेज के अनुसार आम कर्मचारियों में चर्चा है कि पूर्व की बीजेपी सरकार ने पैसा न होने की असल बजह छिपाकर तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाते हुए रिटायर्मेंट की उम्र 2 वर्ष बढ़ा कर 62 साल कर दी. इसमें कर्मचारियों की सहमति लेना भी आवश्यक नहीं समझा गया. और चालाकी यह कि कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, कर्मचारी हित में सरकार का एतिहासिक कदम बता दिया गया. इस बात को लेकर कर्मचारियों में नाराजगी बनी और वे सरकार के खिलाफ गए. बेरोजगार युवकों में भी गलत मैसेज गया, उनके अधिकारों पर कुठाराघात हुआ. नतीजा पूर्व की बीजेपी सरकार सत्ता खो बैठी.

अब कर्मचारी संगठनों के नेताओं का कहना है कि नई कांग्रेस सरकार यह 2 वर्ष की बड़ी हुई अवधि के आदेश वापिस करे और कम से कम यह तो किया ही जाना चाहिए कि कर्मचारियों को विकल्प चुनने का अधिकार दिया जाए.

कोई कर्मचारी जब सेवा में आया, तब उसके लिए 60 वर्ष की सेवा अवधि की शर्त थी, लेकिन अब जब सेवा अवधि बढ़ाई जाती है तो उसमें उसकी सहमति आवश्यक क्यों नहीं? यदि कोई नहीं चाहता तो उसे समय से रिटायर किया जाना चाहिए. 

एक ओर सरकार 50 पार वालों को नाकारा बताते हुए उन पर गाज गिराने की बातें भी करती रही. कहा गया कि 50 पार वाले नाकारा अधिकारी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा. दुसरी ओर रिटायर्मेंट की उम्र 2 वर्ष बढ़ा कर 62 साल कर दी. बेहतर होता कि समय से रिटायर किया जाकर बेरोजगारों को अवसर दिया जाता. 

कर्मचारी संगठनों के नेताओं का कहना है कि क्या लोकसभा चुनाव के पूर्व सरकार इस तरह का कोई वचन कर्मचारियों को दे सकती है? कम से कम यह तो किया ही जाना चाहिए कि कर्मचारियों को विकल्प चुनने का अधिकार दिया जाए. 




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