क्या हम कभी इन जांबाज़ों के खून का बदला ले पाएंगे? कैंडल मार्च कब तक?



''लिख रही हूं पर हाथों  की कलम पहली बार कांप रही है लिखना भी आसान नहीं होता यह आज महसूस कर रही हूँ...!!''



कटोरे में समेटे वह जवानों के मास के लोथड़े ....!! जो कभी एक जवान का अस्तित्व हुआ करता था। वह एक शक्तिशाली जवान का था। जो माँ की कोख़ में संपूर्ण नो माह के गर्भ में सुरक्षित पल अपनी मातृभूमि के लिए तैयार होता रहा। कल विचलित करने वाले दृश्य देख मैं सचमुच अनजाने ही उन सभी माँओं के पास पहुंच गई थी। वह सिमट कर आया एकाध पाव मास।

सोच रही थी और नम आँखे रह रह कर एक ही सवाल से मन को  झिंझोड़ रही थी कि यह वही शख्श है जो कभी अपनी माँ की गोद मे बड़ा हुआ।बहनों की कलाइयों की शान रहा। रिश्तेदारों में प्रिय। वह अपनी प्रेयसी का प्रियतम भी जहाँ दोनों ने मिल कई सतरंगी ख्वाब देखें वह कमज़ोर  पिता, पति और  भाई और बेटा बन धड़कता रहा। पर सशक्त भारत माता का सपूत आज कटोरे में घर आया था अपने नाम की पर्ची के साथ उफ़्फ़फ़ क्या गुज़री होगी माँ पर याद हो आया होगा वह अस्पताल वह नर्स जिसने आँचल में लपेट दिया था उसका कलेजे का अंश। जिसे देख वह फूली नही समाई थी। कैसे किया होगा सामना उस प्रेयसी ने  जब याद आई होगी वह घड़ी जब थामा था उसने उसका हाथ चुटकी भर सिंदूर से इस वादे के साथ कि अब सात जन्मों के साथी है। 

मन आक्रोशित थ। एक स्त्री होने के नाते मैं हर आयाम में बंध सबकी स्थिति महसूस कर रही हूं। एक तरफ गर्वित भी हूं कि दुश्मनो हम अभी भी हार नही मानेंगे। तुम हर बार कोशिश करोगे पर हम अपनी माँ के लिए हँसते हुए जान दे देंगे। बेशक हमने अपने जांबाजों को शहीद होते देखा।पर तुम्हारे वज़ूद से वो कई गुना ऊंचे है। उनकी शहादत ने उनको स्वर्णिम आखरो में याद किया जाएगा। पर हे आंतकियों तुम अपने बारे में सोचो तुम्हे इसके लिए तुम्हारी जननी ओर देश दोनो नही स्वीकारेंगे। तुम हर बार  हमारे जांबाज़ों को तुम्हारे वज़ूद पर हावी होता देखोगे।

मीडिया  बेशक घर  घर पहुँचा कल पर क्या वह माँ के दिल पर क्या गुज़री जान पाया। उन मासूम बच्चो के पिता को  उन को भुलाने में कामयाब हो पाएगा। उस बहन की राखी का जवाब क्या देगा? और उस जीवनसंगिनी का क्या जिसकी आँखे अब कभी न खत्म होने वाले इंतज़ार में पथरा जाएगी उसको कौनसी राह  दिखा पाएगा। सरकार किस तरह की सांत्वना दिलाएगी यह बडे प्रश्न शायद जिसका उत्तर किसी  भी सरकार मीडिया के पास नही है और ना ही उम्मीद.

बस एक ही बात ज़ेहन में कि क्या देश और हम आप इनके शहादत की क़ीमत चुका पाएंगे सदियों तक यह घाव  कभी भर पाएगा? क्या हम कभी इन जांबाज़ों के खून का बदला ले पाएंगे? कब तक कैंडल मार्च लिए हम देश के बुझ चुके चिरागों पर पल भर रोशनी डाल उन्हें अंधेरे में छोड़ देंगे? क्योंकि हम माएँ आज भी जांबाजों को जनने का हौसला रखती हैं तुम चालीस को छुओगे हम चारसौ अँगार जनेंगे। तो आओ और खुलकर वार करो। हम ओर हमारी सेना तुम्हे आह्वान करते हैं। जय हिंद जय भारती.

मैं एक माँ एक पत्नी एक बहन और एक  प्रेयसी अभिमान के साथ कहती हूं कि हमे तुम पर नाज़ है. हर बार तुम पुत्र बन इसी तरह हमारे गर्भ को  अलंकृत ओर गौरवशाली बनाते रहना।।
नमन तुम्हे नमन तुम्हें..

-सुरेखा अग्रवाल    





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