अन्धविश्वासी प्रथाओं और रोग निवारण में कारगर की बातों के चलते पेंगोलिन विलुप्ति की कगार पर



विश्व पेंगोलिन दिवस पर विशेष     
''रोग-निवारण के लिए पेंगोलिन के अंगों को खाने की झूठी और अन्धविश्वासी प्रथाओं और रोग निवारण में कारगर की बातों के चलते पेंगोलिन विलुप्ति की कगार पर आ गया है. आज "विश्व पेंगोलिन दिवस" है. जानते हैं इसके बारे में कुछ ख़ास..''
शाजापुर से हरीश पटेल  



आज "विश्व पेंगोलिन दिवस" है. करीब दो वर्ष पूर्व शाजापुर जिले के शुजालपुर में ये जीव देखा गया था. तात्कालिक एसडीओ राकेश लहरी और शुजालपुर वन मण्डल की टीम की सतर्कता से रेस्क्यू कर इसे सुरक्षित खिवनी के जंगलों में रिलीज़ किया गया था.

भारतीय पैंगोलिन (Indian pangolin), जिसका वैज्ञानिक नाम मैनिस क्रैसिकाउडाटा (Manis crassicaudata) है, पैंगोलिन की एक जीववैज्ञानिक जाति है, जो भारत, श्रीलंका, नेपाल और भूटान में कई मैदानी व हलके पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है. यह पैंगोलिन की आठ जातियों में से एक है और संकटग्रस्त माना जाता है. हर पैंगोलिन जाति की तरह यह भी समूह की बजाय अकेला रहना पसंद करता है और नर व मादा केवल प्रजनन के लिए ही मिलते हैं. इसका अत्याधिक शिकार होता है, जिसमें रोग-निवारण के लिए इसके अंगों को खाने की झूठी और अन्धविश्वासी प्रथाएँ भी भूमिका देती हैं. इस कारणवश यह विलुप्ति की कगार पर आ गया है.

यह हिमाचल प्रदेश के जँगलों में भी पाया जाता है. यहाँ इसे स्थानीय भाषा में सलगर कहते हैं. स्थानीय लोग इस जानवर के मांस को दुलृभ और गुणकारी मानते हैं, जिसके चलते इसका शिकार किया जा रहा है.




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