.. लेकिन मेरे आसपास एक दिया जलता रहा


कुछ सिसकियां
कुछ सुबकियां
कुछ जानी पहचानी सी आवाजें
"कितना भला आदमी था"
किसी के व्यक्त अव्यक्त भाव से दूर
औऱ कुछ अनजान तो नहीं
लेकिन 
कभी सुनी सुनाई आवाज़ भी

"पता देर से चला 
जब मैं बाजार से लौट रहा था"
साथ ही कुछ अपनों की 
प्रलापी रूदन की तड़प
जो कभी तेज़ हो उठती
कभी थम जाती
जाति और रूप से दूर
शाम अकेली हो चली
रात में तब्दील होती
हौले हौले

आखिर रात उतर आई
गहरी घनी रात 
साथ ही चुप सन्नाटा
औऱ थालियों की हल्की हल्की खटपट!!

लेकिन मेरे आसपास
एक दिया जलता रहा
शायद मेरा आखरी साथी
''दिया''

- मनु 



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