एक ज्वलन्त सवाल ...और सुनो होली आने वाली है न!


चार रोज़ बाद
रौनके फिर रौनक होंगी
फिर सड़कों पर 
बारात सजेगी
दुकानों पर बड़े बड़े पटल
फिर जगमगाते रहेंगे
और सुनो होली आने वाली है न
रंगों से पुते तुम्हारे चेहरे 
सड़कों पर भांग के नशे में
फिर हुड़दंग मचाते दिखेंगे
सच ही तो है !
बेनूरी कोई कहाँ सदा ढोता है
वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है!
हमे शिकवा भी नही होगा तुम्हारे इस
नए रंग का
जोश ओ जज्बा दिखाया था तुमने
वाकई मुर्दा जिस्म में हरकत
सी लगी थी हमे
पर सुनो!! आबाद रहना तुम अपने 
रौशन घरों में
लेकिन मेरे पीछे 
मेरी बीवी को अबला कह सताना नही
मेरी नन्ही सी जान को बेटी मान सको तो
मेरे बूढ़े "माँ-बाप" को चक्कर न लगवाना
दफ्तरों के
मेरे बेटे से कोई हो जाये उम्र की गुस्ताखी
तो  
सहेज सको तो ये धरोहर छोड़े जा रहें हैं हम
बोलो भारत के भारती
ऐसा करोगे न !!

- मनु खत्री    

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