यदि अपनी ज़मीन बची रही




यह एक ज़रूरी लड़ाई है 
अपना चूल्हा चक्की बचाने के लिए     

- सुरेन्द्र रघुवंशी     

कभी नहीं रुकी है लड़ाई
अपने हक़ की जीवन के रणक्षेत्र में
तब भी नहीं जब कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी 
अतिक्रमण कर किसी भी प्रकार के विस्तार की
और अब भी नहीं 
जब हमारी नीयत में नहीं आया कोई परिवर्तन

पर जिनको अनाधिकृत अतिक्रमण द्वारा
अपनी विस्तारवादी नीति को ही लागू करके 
खुद को हिटलर का वंशज ही साबित करना है
उनसे नैतिक और मानवीय बने रहने की उम्मीद 
चट्टानों से दूध देने की उम्मीद करना ही है

यह हमारा मनोरंजक चयन नहीं है मटरगश्ती के लिए
बल्कि यह एक ज़रूरी लड़ाई है 
अपना चूल्हा चक्की बचाने के लिए
अपने गाँव डूबने से बचाने के लिए
और जिनको डूबने से भी नहीं बचा पाए
उनके उचित विस्थापन के लिए

यह विस्थापन आपके झूठे वादों के आसमान में 
कभी नहीं होगा हूजूर
उसके लिए हक़ीक़त की धरती चाहिए माननीय
जबकि यह मुद्दा आपकी चिन्ता का विषय नहीं है

देश की अधिकांश आबादी बह रही है
आपके अन्याय की अतिबृष्टि से उपजी बाढ़ में
आपकी कुदृष्टि की काली घटाओं ने निगल लिया है
न्याय के समदर्शी सूरज को

हमें अपने हिस्से की धूप उसके ताप सहित चाहिए
इसीलिए है यह लड़ाई , जो आपसे है नियंताओं!
कि आपने हमारी चोटियों को अपनी मुट्ठी में पकड़ रखा है
आपके इस दैत्याकार हाथ से हमारे नागरिक हाथों का सामना है

रात के इस शीत प्रहर में भी 
जबकि हमें होना था अपने खेतों में कर्तव्यरत 
आपने हमें राजधानी की सड़कों पर ला खड़ा किया है
हालांकि आपकी इच्छा कभी कतई नहीं रही
कि हम राजधानी की सड़कों पर उतर आयें इस तरह
आपकी इच्छाओं की दुनिया ने तो हमें देखना चाहा
अपने समक्ष नतमस्तक और आत्मसमर्पण में करबद्ध

पर हमें नहीं होना था इस तरह शरणं गच्छामि
इसलिए हम उतर आए उस जमीन की रक्षा में 
जिस पर हमें खड़े रहना है
और जिसे आप छीन रहे हो हमारे पैरों के नीचे से

यदि अपनी ज़मीन बची रही
तो विलम्ब से सही काम तो फिर भी कर लेंगे
पर यदि उसे भी छीन ले गए आप 
तो अस्तित्वहीनता के शून्य में
सम्भव ही नहीं रह जायेगा जीवन भी




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