मंदिर का पुजारी शराबी, कबाबी और शबाबी न हो, भले मंत्री/नेता हो! अनोखा आदेश




''एक वो मंदिर और एक ये मंदिर, जिसमें पुजारी या भक्त मांसाहारी, शराब और पर-स्त्री सेवी न हो और नियम के /कानून के मंदिर में इसके बिना काम नहीं चलता. सांसद /विधायक के लिए सब नियमों की छूट है, यानि यदि उन पर अपराध, बलात्कार, डाका, बलवा लूट डकैती आदि के मुकदमे न चल रहे हों तो वे अपात्र घोषित हो जाते हैं.''
भोपाल से डॉक्टर अरविन्द जैन 

बहुत दिनों बाद पुरानी फाइल देख रहा था, अचानक यह समाचार मनपसंद सरकार का पढ़ने मिला, जिसमें बहुत विस्तार से इस बात का खुलासा किया गया है कि पूजा विधि का सर्टिफिकेट कोर्स पास करना जरूरी और मांसाहारी और शराबी नहीं बन सकेंगे मंदिर के पुजारी. तो मैने शबाबी शब्द और जोड़ दिया. वैसे जब दो कर्म होंगे तो तीसरा नहीं होगा या दोनों करेंगे तो तीसरा जरूर से होता है, क्योंकि हाथी के पाँव में सब पाँव समां जाते हैं.


Express news bhopal 7 february 2019
इसमें तमाम नियम कानून और दिशा निर्देश दिए गए हैं. आठवीं पास होना जरुरी, पूजा विधि का प्रमाण पत्र अनिवार्य, जिस मंदिर में पुजारी का पद खाली हो वहां के लिए आवेदन किया जा सकता हैं. अनुविभागीय अधिकारी को आवेदन देना होगा और एक नोटरी से एफिडेविट लेना होगा उसके बाद सार्वजनिक सूचना जारी करके आपत्तियां आमंत्रित करेंगे. अगर आपत्ति नहीं आती तो पटवारी,नायब तहसीलदार और तहसीलदार से प्रतिवेदन लेके पुजारी की नियुक्ति कर दी जाएँगी. इसके अलावा अन्य जानकारियां भी अध्यात्म विभाग के अंतर्गत मिल जाएँगी. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं कारण मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर जो भी पुजारी नियुक्त हो वह शाकाहारी हो, शराब न पीने वाला हो, शबाबी न हो, मच्छली अंडा मांस को ना खाने वाला हो. कारण पुजारी और भगवान का प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता हैं, वह 24 घन्टे, सात दिन और 365 दिन दोनों आसपास होते हैं. वहां किसी ही प्रकार का मिक्सचर नहीं होना चाहिए. 

कोई कोई जगह पुजारी बेचारे लंगोट पहनकर, न प्याज़ खाते, न लहसुन. कट्टर होते हैं. कुछ लोग तो शादी भी नहीं करते कारण भगवान् की सदिच्छा से उसकी पूर्ती अपने आप हो जाती हैं भगवान् का स्थान बहुत पवित्र और आस्था का होता हैं वहां सबकी इच्छा की पूर्ती होती हैं, मनोकामना पूरी होती हैं, वहां मनसा वाचा कर्मणा एक होना चाहिए तभी भगवान से सम्बन्ध स्थापित होते हैं. इस समाचार से बहुत प्रभावित हुआ. 

मुझे वर्ष मई या जून 2014 का दृश्य कौंध पड़ा जिस दिन हमारे प्रधान सेवक संसद भवन को कानून का मंदिर कहकर उसकी सीढ़ियों पर सर झुकाकर/वंदन कर पहली बार उस मंदिर में प्रवेश किया था, उस मंदिर में जाने वाले भक्त कहलाते हैं या भगवान! यह यक्ष्य जैसा प्रश्न चिन्ह हैं यदि सांसद भगवान् हैं तो उन्हें बहुत पूज्य होना होगा, अविकारी, दया सिंधु आदि आदि जितने भी उपयोगी विशेषण होते हैं वे लगते हैं और भक्तों को भी अपने भगवान के सामान साक पाक होना चाहिए, पर मंदिर के पुजारी को शराबी शबाबी कबाबी नहीं होना चाहिए कारण उसका भगवान् बहुत पवित्र, पूज्यनीय होते हैं इसीलिए उसके सामान होना चाहिए. पर यह शर्त लोकसभा या राजयसभा सदस्य के लिए भी हैं जैसे मंत्री वैसे सांसद. आजकल तो मंत्री बिना शराब, कबाब और शबाब के बन नहीं सकते, यह उनकी पहली सीढ़ी हैं ये सब गुणों का होना, जब ये गुण विशेष जब मंत्री के पास होंगे उनके अनुरूप ही उनके भक्त यानी सांसद होते हैं. 

एक वो मंदिर और एक ये मंदिर, जिसमें पुजारी या भक्त मांसाहारी, शराब और पर-स्त्री सेवी न हो और नियम के /कानून के मंदिर में इसके बिना काम नहीं चलता. सांसद /विधायक के लिए सब नियमों की छूट है, यानि यदि उन पर अपराध, बलात्कार, डाका, बलवा लूट डकैती आदि के मुकदमे न चल रहे हों तो वे अपात्र घोषित हो जाते हैं. यानि ये सब अनिवार्य शर्त हैं और इन कारणों से वे माननीय होते हैं और उनका विकास दिन दुगना रात चौगुना होता हैं, जबकि पुजारी को यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हे इतनी दक्षिणा आती है उसमें से हमारा भी हक़ है और दूसरा तुम्हे प्राइवेट पूजा, पाठ, हवन आदि अनेकों काम में जो भी दक्षिणा मिले उसे चाहो तो मिल बांट कर खाओ, अन्यथा ऐसे मंदिर में स्थान्तरण कर दिया जायेगा कि वहां से खुद का खाना, खाना होगा. अच्छी जगह जैसे कोर्ट, कचहरी, अस्पताल, जेल,  रेलवे स्टेशन बसस्टैंड कोतवाली मुख्य मार्ग, मुख्य स्थान जैसे विधानसभा लोक सभा आदि स्थानों में विशेष सुविधा शुल्क लगेगा. एक बार ऐसी जगह बैठ गए तो अगली बार हमें तुम्हारे पास सिफारिश लेने आना पड़ेगा. जैसे विधायक सांसद मंत्री बनने जी तोड़ कोशिश करते हैं बस एक बार उसके बाद तो वे स्वयं मठाधीश बन जाते हैं. 

मनपसंद सरकार द्वारा यह उठाया गया कदम बहुत ही अनुकरणीय और प्रशंसनीय हैं. वैसे जनता को ये काम नहीं करना चाहिए पर मंत्री, धनवान, अफसर, बाबू आदि को यह छूट होना चाहिए. कारण अधिकांश मंत्री जो पहले विधायक रहते हैं उनकी शुरुआत होती हैं शराब, कबाब और शबाब से और मंत्री बनने के बाद सड़क, लोहा, सीमेंट, खदान, पानी, कोयला आदि जितने भी विभाग हैं, उनमें खूब गुंजाईश रहती है खाने की. शराब शबाब और कबाब अन्य --आय (अन्याय) से ही ग्रहण कर सकता है, स्व आय से उतना मज़ा नहीं आता है. 

कम से कम दोनों समाजों का अंतर् समझ में आया. पुजारी की भी निश्चित पोषक और मंत्री नेता विधायक और सांसद की निश्चित पोशाक. एक को मछली अंडा मांस शराब का प्रतिबन्ध. और प्रतिबंधकर्ता होते हैं इन सबके पुजारी. एक स्व कल्याण करने को बाध्य हैं. एक स्व और पर कल्याण हेतु तत्पर हैं. दोनों मंदिरों के पुजारी हैं.  




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