युवाओं से पकौड़े जैसी बातें नहीं, उन्हें बेहतर रोजगार के अवसर दो, ताकि देश का वास्तविक विकास हो सके


''बेशक आधुनिकीकरण हुआ है, पर अभी भी देश के युवाओं को उनकी सम परिस्थितियों के अनुकूल व्यवसाय नहीं मिल रहे हैं. अव्यवस्थित रोजगार प्रणाली और शिक्षित युवाओं के लिए बेहतर रोजगार नियम लागु नहीं हुए हैं. प्रधानमंत्री जी की पकौड़े वाली बात से भी युवा निराश हुए हैं. सवाल है आज के युवा की जो हालत है, उसमें सुधार के बिना देश के विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है?''
- सुरेखा अग्रवाल "स्वरा" लखनऊ     

भारत का असन्तुष्ट युवा 21वीं सदी बदलाव की बयार, आर्थिक स्थितियों में खामियाँ अत्यधिक आधुनिकीकरण और  शिक्षा के साथ और बढ़ती प्रतियोगिता, बढ़ता पाश्चात्यकरण, आधुनिकता का अनुकरण और अनुसरण भी, बौद्धिक स्तर में खुलापन  परंतु पूरी तरह उसे ग्रहण नहीं करना आधा अधूरा ज्ञान, आज परिस्थियाँ ही ऐसी विद्रूप स्थिति लिए हुए हैं कि युवा पीढ़ी समझ ही नहीं पाती कि किसे स्वीकारे और किसे नहीं, अजीब से सामाजिक माहौल में वह खुद को आधुनिक तो मानती है, पर भारतीय समाज की कई संकीर्ण स्थितियां उसे पीछे ढकेलती हैं, वह भीड़ में खो जाता है, मध्यम वर्ग का युवा संतुलित होकर भी अपना संयम खो बैठता है. ग्रामीण स्तर पर युवा का हाल तो और भी बेहद बुरा है. जीवनशैली शिक्षा का अभाव और आधुनिकीकरण ऐसा हावी होता है कि वह इस परिवेश को अपनाने के चक्कर में सीधे गर्त में और अपराध जैसे घिनौने दलदल में फंस जाता है. ज्यादा पाने की होड़ और असन्तुष्टि का भयावह अंजाम. 

दूसरी ओर मध्यम वर्ग का युवा इनका आधा समय कोचिंग और माँ बाप के दुलार में ही चला जाता है और जब वे उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचते हैं, जहाँ इनके सपने उड़ान भरते हैं, प्रबल इच्छाएँ, बदलता परिवेश और सामजिक दायर के साथ शिक्षा प्रतियोगिता की होड़, युवा को झंझोड़ कर रख देती है, वह गरीबी और अपनी मध्यम वर्गीय छवि को मात करने की कोशिश में लगा रहता है, चूँकि संस्कार और घर का दुलार  उन्हें संतुलित जीवन जीने की बजाय और उच्चतम सुविधाओं के चक्कर में वह इतना परेशां हो जाता है कि उसे समझ ही नहीं आता कि अगला कदम क्या उठाएं, कुंठित हो वह तनावग्रस्त हो जाता है. 

आज का युवा बहुत कुछ पाने  की होड़ में वह अनियंत्रित होकर असंतुष्टि के गहन अंधकार में डूबता चला जाता है. अभिप्राय सिर्फ इतना कि 1990 से सामाजिक परिवर्तन चरम पर है, हर कोई संतुलन नहीं बिठा पाता. शिक्षा स्तर प्रतियोगिता की होड़, आधुनिकरण बढ़ा तो है, पर स्वयं रोजगार, और दूसरे रोजगारों का न मिलना, सामाजिक ढांचा आधुनिक होता जा रहा है. विस्तृत परिधि से आगे बढ़ता युवा उसे रोजगार मुहैया नहीं होता. शिक्षा की होड़ में वह बहुत मेहनत करता है और अपनी मेहनत का प्रतिरूप जब उसे नहीं मिलता, तो वह नाउम्मीद हो जाता है. नतीजा मानसिक अवसाद से ग्रस्त नशे की आदत, आत्महत्या और क्राइम शुरू कर देता है. 

बेशक आधुनिकीकरण हुआ है, पर अभी भी देश के युवाओं को उनकी सम परिस्थितियों के अनुकूल व्यवसाय नहीं मिल रहे हैं. अव्यवस्थित रोजगार प्रणाली और शिक्षित युवाओं के लिए बेहतर रोजगार नियम लागु नहीं हुए हैं. प्रधानमंत्री जी की पकौड़े वाली बात से भी युवा निराश हुए हैं. सवाल है आज के युवा की जो हालत है, उसमें सुधार के बिना देश के विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है?

आज आवश्यकता है कि घर, समाज और देश युवाओं का मनोबल बढ़ाएं और उन्हें बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये, और स्वयंभू बनाएं, ताकि आने वाली देश की भावी पीढ़ी संतुष्ट जीवनशैली के साथ एक बेहतरीन समाज का निर्माण कर सके. संतुष्ट युवा देश का उज्ज्वल भविष्य, शुरूवात में ही संतुलित रहेंगे तो देश भी संतुलित और आगाज़ के साथ अंजाम भी बेहतरीन होगा यक़ीनन! तब फक्र से युवा यक़ीनन एक पुराना गीत गुनगुनाएंगे "हम होंगे कामयाब एक दिन ओ हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन.

Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

1 comments:

  1. एकदम सटीक विश्लेषण। समकालीन लेखन एवं विषय की समग्र जानकारी।

    ReplyDelete

abc abc