एक अक्स था.. हुबहु मेरे जैसा


जाने क्या था जो 
निहारना चाहा खुद को ही एक दिन‌
उत्सुकता से 
और मैंने खुद को देखा आइने में 
एक अक्स था.. हुबहु मेरे जैसा 
पर
आंखों को धोखा हुआ था 
मेरा दायां था उसका बायां 
उसका बायां था मेरा दायां 
देह का अक्स भी उल्टा हुआ 
और घबराकर मैने आंखे बंद कर लीं..

अंतर्मन में झांकती रही चंद पल
बंद आंखों से खुद को निहारती रही पल पल
सहज ही अहसास हुआ एक तृप्ति का 
मन की आंख में मिली चरित्र की पांख थी 
और अनायास ही उड़ चली आसमां की ओर....

खुली आंखों ने विस्तारित झूठ दिखाया 
बंद आंखों के संक्षेप में सत्य समाया !!

- शालू जैन

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