जुबान पर चढ़ कर बोलती-सी लगती हैं 'सहोदरी लघुकथा 2' की लघुकथायें




''मोटे-मोटे उपन्यास और लंबी-लंबी कहानियां पढ़ने के लिये समय निकाल पाना सबके लिये संभव नहीं है। बेषक इसमें समय अधिक लगता है। कुछ ऐसे ही दौर से गुजरते हुए पाठकों के लिये लघुकथा विधा का विकास और विस्तार हुआ। वस्तुतः लघुकथा-लेखन कोई सोची-समझी व्यवस्था नहीं, एक स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया थी। वैसे तो यह बहुत पुरानी विधा है, मगर उन्नीस सौ अस्सी के दषक में लघुकथा-लेखन में बहुत तेजी आयी। इस विधा की दर्जनों स्वतंत्र पत्रिकाओं का प्रकाषन शुरू हुआ. लघुकथा के सैकड़ों संकलन छप चुके हैं। यही नहीं, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी लघुकथा को स्थान मिलने लगा और आज भी मिल रहा है। वर्ष 2018 में एक बहुंत ही उम्दा लघुंकथा संकलन हाथ में आया है, जिसका नाम है 'सहोदरी लघुकथा-2'।''

समीक्षा : अंकु श्री की कलम से     


'भाषा सहोदरी-हिंदी' द्वारा प्रकाषित इस पुस्तक में उन्हत्तर लघुकथाकारों की करीब तीन सौ लघुकथाएं संकलित हैं, जो विभिन्न विषयों को समेटे हुए हैं। प्रायः ऐसा देखने में आता है कि लघुकथा संकलनों में कई-कई आलेख छपे होते हैं। मगर प्रस्तुत संकलन में सिर्फ लघुकथाएं छपी हैं, जो इसकी विषिष्टता लगी, क्योंकि आलेखों से संकलन भर जाने के कारण अच्छे लघुकथाकारों को भी समेटना कठिन हो जाता है। 304 पृष्ठों के इस संकलन का गेटअप बहुत आकर्षक और बाइन्डिंग काफी मजबूत है।


उन्हत्तर लघुकथाकारों की करीब तीन सौ लघुंकथाओं को एक साथ पढ़ना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। इसमें लघुकथाकारों ने अनेक विषयों पर अपनी कलम चलायी है। लघुकथा की विषेषता है कम शब्दों में किसी बात को रोचकपूर्वक कह देना। यह सभी जानते हैं कि अपने ही हाथ की पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होतीं। संकलन की तीन सौ लघुकथाओं में भिन्नता तो रहेंगी ही। इनमें से कुछ लघुकथाएं जुबान पर चढ़ कर बोलती-सी लगती हैं।


'भाषा सहोदरी-हिंदी' का छठा अंतर्राष्ट्रीय महाधिवेषन के यादगार अवसर पर 24 और 25 अक्तूबर, 2018 को 'हंसराज कॉलेज', दिल्ली में पधारे सैकड़ों साहित्यकार और साहित्य-प्रेमी इस संकलन के लोकार्पण समारोह के साक्षी बने।


प्रस्तुत संकलन की अनेक लघुकथाएं बहुत अच्छी हैं, जबकि कुछ बेषक नव-लेखन के प्रमाण हैं। इस संकलन को पढ़ने से एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि पुराने लेखकों की भी सभी रचनाएं अच्छी नहीं होतीं। एक-दो लघुकथाएं ऐसी भी हैं, जिनके लेखक को विष्वास नहीं है कि पाठक उसे समझ पायेंगे और इसलिये उन्होंने लघुकथा के अंत में 'नोट' लिख दिया है। एक लेखिका द्वारा अपनी लघुकथाओं के अंत में 'सीख' दी गयी है, जैसे वह पुरानी बालकथा लिख रही हों। कुछ लेखकों द्वारा अपनी लघुकथा के शीर्षक '' '' इन्वर्टेड कॉमा में दिये गये हैं और कुछ ने शीर्षक के बाद - - (डैस-डैस) लगा दिया है। एक लेखक ने अपनी हर लघुकथा के अंत में - - (डैस-डैस) लगा दिया है, जिससे लगता है कि लेखक और कुछ कहना चाहता है और कह नहीं पाया है, जिसे पाठक स्वयं संमझ ले। आमूद-पठन में थोड़ी कमी झलकती है। ऐसा लगता है कि इन बातों की ओर संपादकीय दृष्टि नहीं पड़ पायी है। बेषक संकलन की लघुकथाएं हर साहित्यकार का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। संकलन की कुछ अच्छी लघुकथाओं और उसके लेखक का वर्णन आवष्यक लगता है, जो निम्नवत है,

'अपना-अपना हिन्दुस्तान' और 'गांव की धूल' (अंकुश्री), 'आहट' (अनु पाण्डेय), शेरनी (अपर्णा गुप्ता), 'स्त्रीत्व' और 'बदलते दृष्टिकोण' (डा0 उपमा शर्मा), 'श्रेय' (ऋचा वर्मा), 'खामोषी बोलती है' (कामिनी गोलवलकर), 'आग' (गुंजन खण्डेलवाल), 'बरसात' और 'षिकायत का स्पर्ष' (पंकज जोषी), 'छोटू' (पम्पी सडाना), 'फैसला' (पूनम आनंद), 'जुर्माना' (मनमोहन भाटिया), 'जिन्दगी' और 'एक संघर्ष नया' (मनीषा जोबन देसाई), 'निर्णय', 'इंसानियत' और 'पावन बंधन' (मणिबेन द्विवेदी), 'चिट्ठी-पत्तरी', 'पत्थर पर दूब' और 'होड़' (मिनी मिश्रा), 'टंगटुट्टा' और 'हेल्मेट' (मृणाल आषुतोष), 'अहसास', 'पहचान', 'बहराना साहिब', 'आवष्यकता' और 'मोतियाबिन्द' (लीला कृपलानी), 'श्रवण कुमार' (डा0 लीला मोरे), 'भरोसा' (वन्दना पुणतांबेकर), 'दोहरा मापदंड' (संजय कुमार 'संज'), 'आश्रम' और 'बस' (सौरभ वाचस्पति 'रेणु'), 'बदलती नजरें', 'अच्छा हुआ' और 'स्पष्टीकरण' (संतोष सुपेकर), 'रिमोट वाली गुड़िया', 'डिलीट एकाउन्ट्स' और 'अनोखी चमक' (सुरेष बाबू मिश्रा), 'जख्म' (सतीश खनगवाल), 'निपुणता', 'योग्यता', 'तीर्थाटन' और 'अस्थि के फूल' (संजय पठाडे 'षेष'), 'वृद्धा आश्रम' और 'विदुषी' (सुधा मोदी), 'भलाई का जमाना', 'चोरी' और 'एहसास' (सदानंद कविष्वर), 'परीक्षा की चिंता' और 'हिम्मत' (सीमा भाटिया), 'पापा' और 'उत्साहवर्द्धन' (संजीव आहूजा), 'मुस्कान' और 'अनदेखा' (सागरिका राय), 'जाल' और 'नुस्खा' (सविता इन्द्र गुप्ता)। यह एक संक्षिप्त सूची है, जिसे अंतिम नहीं माना जा सकता।

लेखक को आसपास की घटनाओं, अध्ययन और विचारों से बहुत सारे कथ्य मिल जाते हैं। उसके आधार पर कथानक का ताना-बाना बुन कर लेखक द्वारा कथा या लघुकथा लिखी जाती है। कथानक और षिल्प के अनुसार कथा अच्छी या साधारण बन जाती है। कुछ रचनाएं साधारण से भी निम्न बन कर रह जाती हैं। इस संकलन में भी कुछ लघुकथाओं के कथ्य अच्छा होते हुए भी कमजोर कथानक और षिल्प के कारण वे अच्छे ढ़ंग से पल्लवित-पुष्पित नहीं हो पायी हैं। शब्दों की मितव्ययिता लघुकथा की महत्वपूर्ण शर्त है। संकलन से गुजरते हुए कहीं-कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि मन में आने वाले हर शब्द को कागज पर उतारने के लिये कलम को स्वतंत्र छोड़ देने से लघुकथा खराब हो जाती है।

कुछ लघुकथाओं में भूमिका देकर उसे समझाने का प्रयास किया गया है। कुछ लघुकथाओं के अंत में उपसंहार के तौर पर लेखक द्वारा अपना मत अंकित कर दिया गया है, जो उपदेषात्मक लग रहा है। कहीं-कहीं चलती हुई लघुकथा के बीच में अचानक लेखक ''मैं'' के रूप में प्रकट हो गया है। कुछ लघुकथाएं घटना प्रधान होती हैं, जिनमें कथात्मकता के अभाव के कारण वे साहित्य नहीं रह कर समाचार लगने लगती हैं। लघुकथाओं के ऐसे उदाहरण भी इस संकलन में हैं। इस संकलन की मुख्य विषेषता इसकी विविधता है।

कथाकार जब सीधी नज़र से देखता है तो उसे गहरी और विस्तृत बातें दिखाई देती हैं, जिससे कहानी का सृजन होता है। मगर उसी बात को तिरछी नज़र से देखने पर उसमें गहराई तो रहती है लेकिन विस्तार का अभाव हो जाता है, जिससे लघुकथा का सृजन होता है। किसी कृति के वास्तविक समीक्षक पाठक होते हैं। इसलिये संकलन मंगा कर पढ़ने पर ही इसमें प्रकाषित तीन सौ लघुकथाओं का एक साथ मजा मिल पायेगा और आज लिखी जा रही लघुकथाओं की भी सही जानकारी मिल सकेगी।
प्रेस कॉलोनी, सिदरौल, नामकुम, रांची-834010




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