हम क्यों ठीकरा अपने सिर फूटने दें, कोर्ट कर ही देगा ख़ारिज, और हो गया बिल पास




''सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण बिल को लोकसभा में पास होने में कोई कठिनाई नहीं हुई. बजह साफ़ है, क्योंकि सभी जानते हैं कोर्ट ख़ारिज कर ही देगा. ऐसे में हम क्यों अपने सिर ठीकरा फूटने दें.''
- राकेश तिवारी 



लोकसभा चुनाव से पहले सरकार ने बड़ा दांव खेलते हुए आर्थिक रूप से पिछड़े ऊंची जाति के लोगों को रिझाने के लिए सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण देने की न केवल घोषणा कर दी, बल्कि आनन् फानन में उसे लोकसभा में लाकर पास भी करवा लिया. बताया जा रहा है इस आरक्षण का फायदा ऐसे लोगों को मिलेगा जिसकी कमाई सलाना 8 लाख से कम है, लेकिन अब भी कई सवाल हैं, जो लोगों के बीच उछल कूद कर रहे हैं. 
दैनिक भास्कर राजस्थान में कार्टूनिस्ट
श्री चंद्रशेखर हाड़ा का वास्तविकता दर्शाता कार्टून 

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आम तौर पर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता. आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत एससी के लिए 15, एसटी के लिए 7.5 व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण है. यहां आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. इसीलिए अब तक जिन राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश हुई उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया.



नया नहीं है सवर्णों को आरक्षण देने का मुद्दा
1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था. हालांकि, 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया. बीजेपी ने 2003 में एक मंत्री समूह का गठन किया. हालांकि इसका फायदा नहीं हुआ और वाजपेयी सरकार 2004 का चुनाव हार गई. साल 2006 में कांग्रेस ने भी एक कमेटी बनाई जिसको आर्थिक रूप से पिछड़े उन वर्गों का अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं. लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ.

आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला कोई नया नहीं है. आज से पहले नरसिम्हाराव की सरकार ने 25 सितंबर, 1991 को सवर्णों को 10% आरक्षण दिया था. ठीक वैसे ही जैसे आज दिया गया है. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण को अवैध घोषित कर दिया. 

सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ ने "इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार" केस के फैसले में इस आरक्षण को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आरक्षण का आधार आय व संपत्ति को नहीं माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) में आरक्षण समूह को है , व्यक्ति को नहीं. आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघनहै. 

इसी तरह वर्ष 2017 में गुजरात सरकार द्वारा छह लाख वार्षिक आय वालों तक के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को न्यायालय ने खारिज कर दिया था. राजस्थान सरकार ने 2015 में उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए पांच फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी. उसे भी निरस्त कर दिया गया था. हरियाणा सरकार का ऐसा फैसला भी न्यायालय में नहीं टिक सका. 



डैमेज कंट्रोल और सवर्ण वोट बैंक साधने लाया गया बिल 
असल में बीजेपी को पता है कि ये फैसला न्यायालय में नहीं टिकने वाला. अतीत में इस तरह के कई उदाहरण मौजूद हैं. बावजूद इसके बीजेपी ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला लिया है. इसके पीछे दो मुख्य कारण नज़र आ रहे हैं. 

पहला, बीजेपी का सवर्ण वोट बैंक अब खिसकने लगा है और उसे भय है कि 2019 तक यह पूर्णतः उसके पक्ष में नहीं रहने वाला. 
दूसरा, एससी /एसटी ऐक्ट के बाद सवर्णों के बीच हुए डैमेज कंट्रोल को कम करने के लिए. 

चुनाव नजदीक है तो इस बात की पूरी संभावना है कि नोटा या अन्य दलों की तरफ़ भागने वाला औसत बुद्धि सवर्ण वोटबैंक इससे पुनः बीजेपी की तरफ लौटेगा. जहाँ 2.50 लाख से ऊपर के लोग इन्कम टेक्स के दायरे में आते हैं, वहां 8 लाख तक के गरीबी में आयेंगे तो ऐसे लोगों का मत प्रतिशत 95 प्रतिशत तक होगा, जो कि नियत पर सवालिया निशान लगाता है. कुल मिला कर कहा जा सकता है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का रास्ता अड़चनों से भरा हुआ है. इसलिए इतनी जल्दी इसे लेकर कोई भी सरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकती. 

और यही कारण है कि लोकसभा में पास होने में कोई कठिनाई नहीं हुए, सभी चुपचाप पास कर दिए, क्योंकि सभी जानते हैं कोर्ट ख़ारिज कर ही देगा. ऐसे में हम क्यों अपने सिर ठीकरा फूटने दें.




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