रोयेगी रात जब, तभी तुम खिल-खिलाओगी!


सुनो प्राजक्ता !
पवित्र और पूजनीय थीं तुम 
पहले से ...
जान ली हूँ जब से तुझे 
भाव से भर उठी मैं अकिंचन !
सुना कि दिन -रात खिलखिलाती थीं तुम 
जब स्वर्ग में रहतीं थी तुम ।
भर अँजुरी जब उड़ेला कृष्ण ने तुमको..
बस गयीं रुक्मिणी के मन- प्राण में तुम!
हुई सुवासित इत्र बन कर 
और उड़ चली दूर तलक।
सुना कि ...
सत्यभामा जल गईं थी उसी पल 
रुक्मिणी को देख कर।
जिद कर बैठीं कृष्ण से 
मुझे चाहिए तो चाहिए बस 
लाओ नाथ ! कैसे भी कर! 
प्राण यहीं तज दूँगी 
अगर यह न उतर पाई मेरे आँगन में 
वृक्ष बनकर।
एक न चली 
सत्यभामा के आगे उनकी...
इंद्र की भी थीं प्राण- प्रिया तुम 
रख लिए हिये पर पत्थर
जिद के आगे हार गए 
हरि की हार समझकर...
सौंप दिया कृष्ण को मजबूर होकर।
पर मढ़ दिया एक श्राप माथे पर ...
जा तू जा ..
चाँद के आगोश में ही मुस्कुराओगी 
रोयेगी रात जब, तभी तुम खिल-खिलाओगी!

उतर आई वो स्वर्गिक परी 
इस मर्त्यलोक में 
रोपित कर दिया कृष्ण ने
सत्यभामा के आँगन में
पर हरि की लीला हरि ही जानें
वृक्ष रह गया था बस इधर 
पर झरने लगी वो 
रुक्मिणी के आँगन में।
हरसिंगार बनकर।

सुनो प्राजक्ता !
दर्द में भी मुस्कुराने का हुनर 
स्वर्ग से ही आयी हो क्या तुम सीखकर?
आज बस मुग्ध हुई हूँ 
ये तुम्हारा रूप देखकर 
जड़ो से दूर रहकर भी 
खिलखिलाई जो तुम इस कदर!
सहेज ली हूँ आज तुम्हे अँजुरी भर कर ।


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News Digital India 18

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1 comments:

  1. Nice one Rashmi ..
    I m not able to comment on your fb page.
    You can join pratilipi also.I have also posted there .

    ReplyDelete

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