वक़्त का पहिया


बेशक़ लफ्ज़ बीत गए
और मायनों में
रह गया तुम्हारा होना
मात्र मायने ही थे
जो हमारे दरमियान
जिंदा रह गए बेतकल्लुफ़ होकर
असल लफ़्ज़ों में शायद
तुम्हे समेट ही
नहीं पाया, वक़्त का पहिया
और मायनों में उतर आई नमी
सुनो तुम सी है
अक़्सर ये नमी
बीज को समाहित कर लेती है
बीज में समाहित नहीं होती
तुम्हारी इसी नमी का ब्रह्मचर्य
मेरे वज़ूद का हिस्सा
बन पाक़ीज़ा सी
मुलाकात को मुकम्मल
करता है
हाँ तुम नमी सी मेरी मिट्टी पर
ठहरी हो.. 
- मनु      

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News Digital India 18

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