आखिर कैसे बदल गया देश का माहौल?


आमजन के लिए परेशानी का सबब बनी बेवजह की नोटबन्दी 
और उस पर तड़का जीएसटी का 

कांग्रेस की जीत पर अभी माहौल बदला बदला सा है, लेकिन क्या सच में जीत कांग्रेस की हुई या जनतांत्रिक माहौल में आम जनता का समय और समर्थन अभी भी भाजपा के साथ है. इस विषय पर खुलासा तो असल में लोकसभा के चुनाव परिणाम ही बताएंगे. लेकिन असलियत ये है कि कॉंग्रेस को मिटाना इतना आसान नहीं है और विशेषकर हिन्दूवादी विचारधारा का प्रवचन देकर, हमारे देश में जनता किसी भी क्षेत्र की हो, लेकिन देश के संवेदनशील मामलों में भाषा से ऊपर आता है आमजन की भावनाओं का स्वर और ये बात कुछ एकमार्गी समाज के साथ साथ कट्टरपंथी धारा को भी समझना होगा. अब सवाल आता है कि कॉंग्रेस वापिस कैसे हुई तो इस पर बहस नहीं की जा सकती, क्योंकि हमारे देश में दो मानसिकता हावी हैं. 
- मनु खत्री 


एक है देश हित पर चर्चा वाले लोग. दूसरे धर्म को अपनी स्कूल की किताब समझने वाले लोग, लेकिन तीसरी अबसे ताकतवर कड़ी को ये लोग भूल जाते हैं वो है आम जनता. सीधी सी बात है आम जन को अपने घर परिवार और कैरियर से मतलब है न कि आपके बेमुद्दों को मुद्दा बना कर उलझने से.

भाजपा की हार का कारण तलाशना भी मुश्किल नहीं है, लेकिन होता क्या है कि अपनी कमजोरियों को चर्चा में न लाकर अपनी बड़ाई करने के चक्कर में ये परम बुद्धिजीवी अपनी छवि और कमजोर करते जाते हैं.  कॉंग्रेस की जीत के पीछे कुछ बड़े कारण ये भी हैं- 

नम्बर एक 
एन चुनाव के वक़्त किसानों का दिल्ली तक का मार्च सभी राज्यों के किसानों को एकजुट कर गया.

नम्बर दो 
पिछले लगभग 2 सालों से भाजपा की बयानबाजी, जिसने लोगों के दिल में कॉंग्रेस की छवि को बहुत हद तक अच्छा कर दिया.

नम्बर तीन 
सबसे आम जरूरत बन गया पेट्रोल और डीजल की कीमतों का लगातार बढ़ते जाना. भले ही ये अंतराष्ट्रीय कारणों से हुआ हो, लेकिन देश के भीतर तो इसे सन्तुलित किया जा सकता था और प्रदेश सरकारों ने अपने हिस्से का टैक्स बिना छोड़े पेट्रोल के मामले में उदासीनता अपनाई.

नम्बर चार 
आम जनता के लिए कोई सुरक्षित माहौल नहीं बना पाई भाजपा और फिर वही भाजपा का कट्टरता भरा चेहरा जनता के सामने आया.

नम्बर पांच 
भले ही मोदी को लोग ताकतवर सरदार के रूप में जानते हो, लेकिन पीछे उनके जो टीम है, उससे जुड़े मझौले कद के नेता अपनी भूमिकाओं में बेवजह का दबदबा दिखाते रहे हैं. 

और इन सबसे ऊपर जिस बात ने परेशानी पैदा की आमजन के लिए, सभी छोटे बड़े व्यापारियों के लिए वो है बेवजह की नोटबन्दी और उस पर तड़का जीएसटी का. नोटबन्दी के पीछे ये कारण देना कि काश्मीर के हालातों पर काबू किया जा सकेगा. जरा अजीब सी बात है जिन लोगों के सर खून सवार हो, उन्हें काबू करने के लिए सामने से किये गए कारगर कदम काम आते हैं न कि पूरे देश में हलचल पैदा करके या ये हवाला देकर कि कालाधन बाहर लाना है. तब भी यह बेकार सा तर्क है. 

कालाधन इतनी सी कसरत से बाहर नहीं आ सकता. उसके लिए कुछ अन्य कदमों की जरूरत है, जिस पर ये बड़े नेतागण कभी राज़ी नही होंगे. फिर जीएसटी का कदम किस एंगल से सही है ये खुद इसे लागू करने वाले भी नहीं बता सके. बस तर्क देते रहने से आम जनता की व्यवसाय को आप सही नहीं कर सकते और इसी तारतम्य में एक और कशमकश का निर्णय म्यूच्यूअल फंड्स के नियमावली में परिवर्तन करके एक और मुश्किल पैदा की गई देश के भीतर अपने गाड़े कमाई का हिस्सा जमा करने वालों की जेब पर.

अब बात करे देश के खजाने पर 
विभिन्न देशों के दौरे तो एक सवाल जनता जो पूछ रही है अपने भीतर ही कि क्या इन यात्राओं पर हुआ खर्च देश के खजाने पर असर नहीं डाल रहा?
अब सवाल है क्या किसी पार्टी के पास वाकई कोई करिश्माई नेता था या है, जो देश की जनता को सुकून दे सके तो शायद नहीं. जो भी नया नेता आएगा वह अपनी व्यक्तिगत विचारधारा का गुलाम होगा इस बात को नकारा नहीं जा सकता. और व्यक्तिगत विचारधारा को जनता के सामने देश हित का मुखोटा पहना कर पेश करके ज्यादा देर ठहरा नहीं जा सकता.

उम्मीद कि इस लेख को बहस का मुद्दा न बनाकर इस पर बारीकी से विचार करेंगे.  


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