समानता के लिए जिस बात की जरूरत है, वो आज भी दूर की कौड़ी




''जब सरकारें नाकाम होने लगती हैं, तब आरक्षण, ऋण माफी, बेरोजगारी भत्ता, धार्मिक आधार पर कानून जैसे लालच देने पर उतर आती हैं.'' 
- मनोज कौशल सोनी 


सवाल यह है कि देश को एक करने के लिए आरक्षण बढाने की जरूरत थी या खत्म करने की? संविधान बराबरी की बात करता है, ये कौन सी बराबरी है? ऐसे निर्णयों से लगता है, देश को एक सूत्र में बांधने के लिए समानता के लिए जिस बात की जरूरत है, वो दूर की कौड़ी लगती है. सभी दलो ने संबिधान की मूल भावना, समानता को मिट्टी में मिलाने का काम ही किया है. आरक्षण खत्म करने का प्रयास करना चाहिए, न कि बढाने का.

सभी वर्गो को आर्थिक आधार पर सुविधाएं मिलनी चाहिए, जिससे सभी आगे बढ़ें, आरक्षण नहीं. जब आप जरूरतमंद तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार नहीं पहुँचा पाते तो अपनी नाकामी छुपाने... लालच और भीख देने का काम करते हैं. अब देखना यह है कि सबर्ण इसे किस तरह से लेते हैं.

इस देश की राजनीति वोट पर आधारित है. नेताओ से वोट के लिए, सत्ता के लिए कुछ भी करवा लीजिये। संविधान की व्याख्या ये अपने शब्दों में कर देंगे. यह मूलभूत अधिकारों का हनन है. जब सरकारें नाकाम होने लगती हैं, तब आरक्षण, ऋण माफी, बेरोजगारी भत्ता, धार्मिक आधार पर कानून जैसे लालच देने पर उतर आती हैं. 

जनता को इसका विरोध करना चाहिए. लालची और भिखारी बनने से अच्छा है, हम संविधान में दिए अपने अधिकारों को मांगें, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और मूलभूत अधिकारों को मांगें, राजनीति ने हमे अपनी सत्ता के लिए लालची और भिखारी बना कर रखा है हमे आर्थिक आधार पर सुविधाये दीजिये जाति आधारित नहीं. आरक्षण नहीं, लालच नहीं, भींख नहीं.. अधिकार चाहिए. 




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