मासूम बारिशों के संग..


कितना मासूम  सा है न यह ख़्याल
जब तेरी बगिया से मिट्टी चुरा ले आती
 थी मैं अपने आँगन में..!

याद हैं तुम्हारी बरसती आँखें अक्सर
उन्हें सींचा करती थी। 
सुनो उस खिली फुलवारी में
तेरा मेरा घरौंदा अक्सर
महफूज़ रहता था बारिशों में भी...!!

सुनो वह घरौंदा आज भी 
महफूज़ हैमेरी आँखों की बरसातों के
बावज़ूद..!!

सींच आया करो न  कभी कभी
तुम भी उस बगिया में बने
घरौंदे को अपनी उम्रदराज़ होती
मासूम बारिशों के संग..
- सुरेखा अग्रवाल,  लखनऊ  

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