तुम्हारे क़दमों में


आऊँगी न एक बार 
तुम्हारे क़दमों में बिछने..
तुम्हारे आख़री ख़त से पहले
तुम्हारे अवचेतन मन की 
चेतना में जगने 
बन स्वाति सी बूँद..
हाँ पगलाई सी मैं  
खिलने  की कोशिश करुँगी 
तुम्हारी फैलती  
लताओं सी शिराओं में 
जहाँ प्रवाह बन सहेजूंगी तुम्हे 
उस भीगी मिट्टी में 
बन अंकुर तुम्हारे इश्क का..
फूलों की वरमाला में 
श्रृंगार बन उतरूंगी तुम्हारे आँगन में 
ठीक उसी तरफ़ मुँह घुमाएं 
जहाँ तुम्हारा चेहरा होगा 
मेरी देहरी पर
सुनो वादे के मुताबिक 
"शाम को मिलूँगी"
तुम्हारी ख़ामोशी की सेज़ पर
बन अनाम सी मैं
वरमाला थामे
तुम्हारी रूह को
वरण करने 
तुम्हारे आख़री
ख़त से पहले मैं..
तुम्हारे मन आँगन में.
- सुरेखा अग्रवाल


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